Mohsin Naqvi Nazm In Hindi Part 2 - मोहसिन नक़वी


Pagal Aanko Waali Ladki

पागल आँखों वाली लड़की 
इतने महँगे ख़्वाब न देखो 
थक जाओगी 
काँच से नाज़ुक ख़्वाब तुम्हारे 
टूट गए तो 
पछताओगी 
सोच का सारा उजला कुंदन 
ज़ब्त की राख में घुल जाएगा 
कच्चे-पक्के रिश्तों की ख़ुश्बू का रेशम 
खुल जाएगा 
तुम क्या जानो 
ख़्वाब सफ़र की धूप के तेशे 
ख़्वाब अधूरी रात का दोज़ख़ 
ख़्वाब ख़यालों का पछतावा 
ख़्वाबों की मंज़िल रुस्वाई 
ख़्वाबों का हासिल तन्हाई 
तुम क्या जानो 
महँगे ख़्वाब ख़रीदना हों तो 
आँखें बेचना पड़ती हैं या 
रिश्ते भूलना पड़ते हैं 
अंदेशों की रेत न फाँको 
प्यास की ओट सराब न देखो 
इतने महँगे ख़्वाब न देखो 
थक जाओगी 

Pagal Aankho Waali Ladki
Itne Mehange Khwaab N Dekho
Thak Jaogi
Kaanch Se Najuk Khwaab Tumhare
Toot Gaye Toh
Pachtaaogi
Soch Ka Saara Ujla Kundan
Zabt Ki Raakh Me Ghul Jayega
Kachche Pakke Rishton Ki Khusbu Ka Resham
Khul Jayega
Tum Kya Jaano
Khwaab Safar Ki Dhoop Ke Teshe
Khwaab Adhoori Raat Ka Dojakh
Khwaab Khayalon Ka Pachtaawa
Khwaab Ki Manzil Ruswaayi
Khwaab Ka Haasil Tanhaayi
Tum Kya Jaano
Mehange khwaab Kharidana Ho To
Aankhe Bechani Padti Hai Ya
Rishte Bhoolne Padte Hai
Andeshon Ki Ret N Faakon
Pyaas Ki Oat Saraab N Dekho
Itne Mehange Khwaab N Dekho
Thak Jaaogi

Meri Udaasi Ka Zard Mausam

मिरी उदासी का ज़र्द मौसम 
अगर किसी दिन 
मिरी बुझी आँख के किनारे 
भिगो भिगो कर 
अना के पाताल की किसी तह में 
एक पल को ठहर गया तो 
मुझे यक़ीं है 
कि टूटते दिल में ख़्वाहिशों का 
कोई छनाका 
मिरा बदन भी न सुन ले 

Meri Udaasi Ka Zard Mausam
Agar Kisi Din
Meri Bujhi Aankho Ke Kinaare
Bhigo-Bhigo Kar na Ke Pataal Ki Kisi Tah Me
Ek Pal Ko Thehar Gaya Toh
Mujhe Yakeen Hai
Ki Tootate Dil Me Khwahisho Ka
Koi Chanaka
Mera Badan Bhi N Sun Le

Bahut Dino Baad Tere Khat Ke

बहुत दिनों बा'द 
तेरे ख़त के उदास लफ़्ज़ों ने 
तेरी चाहत के ज़ाइक़ों की तमाम ख़ुश्बू 
मिरी रगों में उंडेल दी है 
बहुत दिनों बा'द 
तेरी बातें 
तिरी मुलाक़ात की धनक से दहकती रातें 
उजाड़ आँखों के प्यास पाताल की तहों में 
विसाल-वा'दों की चंद चिंगारियों को साँसों की आँच दे कर 
शरीर शो'लों की सर-कशी के तमाम तेवर 
सिखा गई हैं 
तिरे महकते महीन लफ़्ज़ों की आबशारें 
बहुत दिनों बा'द फिर से 
मुझ को रुला गई हैं 
बहुत दिनों बा'द 
मैं ने सोचा तो याद आया 
कि मेरे अंदर की राख के ढेर पर अभी तक 
तिरे ज़माने लिखे हुए हैं 
सभी फ़साने लिखे हुए हैं 
बहुत दिनों बा'द 
मैं ने सोचा तो याद आया 
कि तेरी यादों की किर्चियाँ 
मुझ से खो गई हैं 
तिरे बदन की तमाम ख़ुश्बू 
बिखर गई है 
तिरे ज़माने की चाहतीं 
सब निशानियाँ 
सब शरारतें 
सब हिकायतें सब शिकायतें जो कभी हुनर में 
ख़याल थीं ख़्वाब हो गई हैं 
बहुत दिनों बा'द 
मैं ने सोचा तो याद आया 
कि मैं भी कितना बदल गया हूँ 
बिछड़ के तुझ से 
कई लकीरों में ढल गया हूँ 
मैं अपने सिगरेट के बे-इरादा धुएँ की सूरत 
हवा में तहलील हो गया हूँ 
न ढूँढ मेरी वफ़ा के नक़्श-ए-क़दम के रेज़े 
कि मैं तो तेरी तलाश के बे-कनार सहरा में 
वहम के बे-अमाँ बगूलों के वार सह कर 
उदास रह कर 
न-जाने किस रह में खो गया हूँ 
बिछड़ के तुझ से तिरी तरह क्या बताऊँ मैं भी 
न जाने किस किस का हो गया हूँ 
बहुत दिनों बा'द 
मैं ने सोचा तो याद आया 

Aaj Tanhaai Ne Thoda




आज तन्हाई ने थोड़ा सा दिलासा जो दिया 
कितने रूठे हुए साथी मुझे याद आए हैं 
मौसम-ए-वस्ल की किरनों का वो अम्बोह रवाँ 
जिस के हमराह किसी ज़ोहरा-जबीं की डोली 
ऐसे उतरी थी कि जैसे कोई आयत उतरे 
हिज्र की शाम के बिखरे हुए काजल की लकीर 
जिस ने आँखों के गुलाबों पे शफ़क़ छिड़की थी 
जैसे ख़ुश्बू किसी जंगल में बरहना ठहरे 
ख़िल्क़त-ए-शहर की जानिब से मलामत का अज़ाब 
जिस ने अक्सर मुझे होने का यक़ीं बख़्शा था 
दस्त-ए-आदाएँ वो खिंचती हुई तोहमत की कमाँ 
बारिश-ए-संग में खुलती हुई तीरों की दुकाँ 
मेहरबाँ दोस्त रिफ़ाक़त का भरम रखते हुए 
अजनबी लोग दिल-ओ-जाँ में क़दम रखते हुए 
आज तन्हाई ने थोड़ा सा दिलासा जो दिया 
कितने रूठे हुए साथी मुझे याद आए हैं 
अब न पिंदार-ए-वफ़ा है न मोहब्बत की जज़ा 
दस्त-आदा की कशिश है न रफ़ीक़ों की सज़ा 
तख़्ता-ए-दार न मंसब न अदालत की ख़लिश 
अब तो इक चीख़ सी होंटों में दबी रहती है 
रास आएगा किसे दश्त-ए-बला मेरे बा'द 
कौन माँगेगा उजड़ने की दुआ मेरे बा'द 
आज तन्हाई ने थोड़ा सा दिलासा जो दिया 


Bahut Dino Se

बहुत दिनों से 
वो शाख़-ए-महताब कट चुकी है 
कि जिस पे तुम ने गिरफ़्त-ए-वा'दा की रेशमी शाल के सितारे सजा दिए थे 
बहुत दिनों से 
वो गर्द-ए-एहसास छट चुकी है 
कि जिस के ज़र्रों पे तुम ने 
पलकों की झालरों के तमाम नीलम लुटा दिए थे 
और अब तो यूँ है कि जैसे 
लब-बस्ता हिजरतों का हर एक लम्हा 
तवील सदियों को ओढ़ कर साँस ले रहा है 
और अब तो यूँ है कि जैसे तुम ने 
पहाड़ रातों को 
मेरी अंधी उजाड़ आँखों में 
रेज़ा रेज़ा बसा दिया है 
कि जैसे मैं ने 
फ़िगार-दिल का हुनर-असासा 
कहीं छुपा कर भुला दिया है 
और अब तो यूँ है कि 
अपनी आँखों पे हाथ रख कर 
मिरे बदन पर सजे हुए आबलों से बहता लहू न देखो 
मुझे कभी सुर्ख़-रू न देखो 
न मेरी यादों के जलते-बुझते निशाँ कुरेदो 
न मेरे मक़्तल की ख़ाक देखो 
और अब तो यूँ है कि 
अपनी आँखों के ख़्वाब 
अपने दरीदा-दामन के चाक देखो 
कि गर्द-ए-एहसास छट चुकी है 
कि शाख़-ए-महताब कट चुकी है 

Maine Is Taur Se Chaha

मैने इस तौर से चाहा तुझे अक्सर जाना
जैसे महताब को बे -अंत समंदर चाहे
जैसे सूरज की किरण सीप के दिल में उतरे
जैसे खुशबू को हवा , रंग से हट कर चाहे
जैसे पत्थर के कलेजे से किरण फूटती है
जैसे गुंचे खुले मौसम से हिना मांगते हैं 
जैसे ख्वाबों में खयालों की कमान टूटती है
जैसे बारिश की दुआ आबला -पा मांगते हैं
मेरा हर ख्वाब मेरे सच की गवाही देगा
वुस ’अत -ए -दीद ने तुझ से तेरी ख्वाहिश की है
मेरी सोचों में कभी देख सरापा अपना !
मैंने दुनिया से अलग तेरी परस्तीश की है

Khwahish-e-Deed Ka Mausam
 
ख्वाहिश -ए -दीद का मौसम कभी धुंधला जो हुआ 
नोच डाली हैं जमाने की नकाबें मैंने 
तेरी पलकों पे उतरती हुई सुबहों के लिए
तोड़ डाली हैं सितारों की तनाबें मैंने
मैने चाहा कि तेरे हुस्न कि गुलनार फिजा
मेरी ग़ज़लों की कतारों से महकती जाए
मैंने चाहा कि मेरे फ़न के गुलिस्ताँ की बहार
तेरी आँखों के गुलाबों से महकती जाए
तय तो ये था के सजते रहे लफ्जों के कंवल 
मेरे खामोश ख़यालों में तकल्लुम तेरा
रक्स करता रहे , भरता रहे , खुशबू का खुमार 
मेरी ख्वाहिश के जज़ीरों में तकल्लुम तेरा
तू मगर अजनबी माहौल की पर्वर्दा किरन
मेरी बुझती हुई रातों को सहर कर न सकी
तेरी साँसों में मसीहाई तो थी लेकिन 
तू भी चारा-ए-जख्म-ए-ग़म-ए-दीदा-ए-तर , कर न सकी.

Tujhko Maloom Hi Kab Hai

तुझ को मालूम ही कब है कि किसी दर्द का दाग
आँख से दिल में उतर जाए तो क्या होता है ???
तू कि सीमाब तबीयत है तुझे क्या मालूम
मौसम -ए -हिज्र ठहर जाए तो क्या होता है ???
तू ने उस मोड पे तोड़ा है त ’अल्लुक कि जहां
देख सकता नहीं कोई भी पलट कर जानां 
अब यह आलम है कि आँखें जो खुलेंगी अपनी
याद आएगा तेरी दीद का मंज़र जानां 
मुझ से मांगेगा तेरे एहद -ए -मोहब्बत का हिसाब
तेरे हिज़्रा का दहकता हुआ महशर जानां
यूं मेरे दिल के बराबर तेरा गम आया है
जैसे शीशे के मुक़ाबिल कोई पत्थर जानां  !!!
जैसे महताब को बे -अंत समंदर चाहे
मैंने इस तौर से चाहा तुझे अक्सर जाना


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