Bashir Badr Shayari In Hindi | बशीर बद्र शायरी इन हिंदी

 

Bashir Badr Shayari In Hindi | बशीर बद्र शायरी इन हिंदी


 

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलानें में

-बशीर बद्र 

 

Log Toot Jaate Hai Ek Ghar Banane Me

Tum Taras Nahi Khate Bastiyaan Jalane Me

-Bashir Badr


कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता

-बशीर बद्र 


Kuch Toh Majbooriyaan Rahi Hongi

Yun Koi Bewafa Nahi Hota

-Bashir Badr


 

तुम मेरी ज़िन्दगी हो,ये सच है
ज़िन्दगी का मगर भरोसा क्या

-बशीर बद्र 


Tum Meri Zindagi Ho, Ye Sach Hai

Zindagi Ka Magar Bharosa Kya

-Bashir Badr


तुम अभी शहर में क्या नए आए हो
रुक गए राह में हादसा देख कर

-बशीर बद्र 


Tum Abhi Shehar Me Kya Naye Aaye Ho

Ruk Gaye Raah Me Hadasa Dekh Kar

-Bashir Badr


उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाये 

-बशीर बद्र 


Ujaale Apni Yaadon Ke Hamare Sath Rehne Do

N Jaane Kis Gali Me Zindagi Ki Shaam Ho Jaaye

-Bashir Badr


इतनी मिलती है मेरी गज़लों से सूरत तेरी
लोग तुझ को मेरा महबूब समझते होंगे 

-बशीर बद्र 


Itni Milti Hai Meri Ghazalon Se Soorat Teri

Log Tujhko Mera Mehboob Samajhte Honge

-Bashir Badr


शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है

-बशीर बद्र 


Shohrat Ki Bulandi Bhi Pal Bhar Ka Tamasha Hai

Jis Daal Pe Baithe Ho Toot Bhi Sakti Hai

-Bashir Badr


 

न जी भर के देखा न कुछ बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की

-बशीर बद्र 


N Ji Bhar Ke Dekha N Kuch Baat Ki

Badi Aarju Thi Mulakaat Ke

-Bashir Badr


 

बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता

-बशीर बद्र 


Bade Logon Se Milne Me Hamesha Fasala Rakhna

Jahan Dariya Samundar Se Mila Dariya Nahi Rehta

-Bashir Badr


 मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी

-बशीर बद्र 


Musafir Hai Hum Bhi Musafir Ho Tum Bhi

Kisi Mod Par Phir Mulakaat Hogi

-Bashir Badr


 

उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में
फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते

-बशीर बद्र 


Udne Do Parindo Ko Abhi Shokh Hawa Me

Phir Laut Ke Bachpan Ke Jamane Nahi Aate

-Bashir Badr


 

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो

-बशीर बद्र 


Koi Hath Bhi N Milayega Jo Gale Miloge Tapaak Se

Ye Naye Mijaaz Ka Shehar Hai Zara Fasale Se Mila Karo


-Bashir Badr


 

आशिक़ी में बहुत ज़रूरी है
बेवफ़ाई कभी कभी करना

-बशीर बद्र 


Aashiqui Me Bahut Zaruri Hai

Bewafaai Kabhi-Kabhi Karna

-Bashir Badr


 

अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा
मगर तुम्हारी तरह कौन मुझ को चाहेगा

-बशीर बद्र 


Agar Talash Karu Koi Mil Hi Jayega

Magar Tumhari Tarah Kaun Mujh Ko Chahega

-Bashir Badr


 

आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा

-बशीर बद्र 


Aankho Me Raha Dil Me Utar Kar Nahi Dekha

Kashti Ke Musafir Ne Samundar Nahi Dekha

-Bashir Badr


 

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा

-बशीर बद्र 


Sar Jhukaoge Toh Patthar Devata Ho Jayega

Itna Mat Chaho Use Wo Bewafa Ho Jayega

-Bashir Badr

 

तुम मोहब्बत को खेल कहते हो
हम ने बर्बाद ज़िंदगी कर ली

-बशीर बद्र 


Tum Mohabbat Ko Khel Kehte Ho

Hum Ne Barbaad Zindagi Kar Li

-Bashir Badr


 

एक औरत से वफ़ा करने का ये तोहफ़ा मिला
जाने कितनी औरतों की बद-दुआएँ साथ हैं

-बशीर बद्र 


Ek Aurat Se Wafa Karne Ka Ye Tohfa Mila

Jaane Kitni Auraton Ki Bad-Duaaye Sath Hai

-Bashir Badr


 

 दिल की बस्ती पुरानी दिल्ली है
जो भी गुज़रा है उस ने लूटा है

-बशीर बद्र 


Dil Ki Basti Puraani Dilli Hai

Jo Bhi Gujra Hai Sabne Loota Hai

-Bashir Badr

 

ख़ुदा हम को



ख़ुदा हम को ऐसी ख़ुदाई न दे
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे

 

ख़तावार समझेगी दुनिया तुझे
अब इतनी भी ज़्यादा सफ़ाई न दे

 

हँसो आज इतना कि इस शोर में
सदा सिसकियों की सुनाई न दे

 

अभी तो बदन में लहू है बहुत
कलम छीन ले रोशनाई न दे

 

मुझे अपनी चादर से यूँ ढाँप लो
ज़मीं आसमाँ कुछ दिखाई न दे

 

ग़ुलामी को बरकत समझने लगें
असीरों को ऐसी रिहाई न दे

 

मुझे ऐसी जन्नत नहीं चाहिए
जहाँ से मदीना दिखाई न दे

 

मैं अश्कों से नाम-ए-मुहम्मद लिखूँ
क़लम छीन ले रोशनाई न दे

 

ख़ुदा ऐसे इरफ़ान का नाम है
रहे सामने और दिखाई न दे

 

यूँ ही बे-सबब न फिरा करो


यूँ ही बे-सबब न फिरा करो,कोई शाम घर में भी रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है,उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो

 

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नये मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो

 

अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आयेगा कोई जायेगा
तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया, उसे भूलने की दुआ करो

 

मुझे इश्तहार-सी लगती हैं, ये मोहब्बतों की कहानियाँ
जो कहा नहीं वो सुना करो, जो सुना नहीं वो कहा करो

 

कभी हुस्न-ए-पर्दानशीं भी हो ज़रा आशिक़ाना लिबास में
जो मैं बन-सँवर के कहीं चलूँ, मेरे साथ तुम भी चला करो

 

ये ख़िज़ाँ की ज़र्द-सी शाम में, जो उदास पेड़ के पास है
ये तुम्हारे घर की बहार है, इसे आँसुओं से हरा करो

 

नहीं बे-हिजाब वो चाँद-सा कि नज़र का कोई असर नहीं
उसे इतनी गर्मी-ए-शौक़ से बड़ी देर तक न तका करो

 

Yun Hi Be-Sabab N Phira Karo


Yun Hi Be-Sabab N Phira Karo Koi Shaam Ghar Me Bhi Raha Karo
Wo Ghazal Ki Sachchi Kitaab Hai Use Chupke-Chupke Padha Karo

 

Koi Hath Bhi N Milayega Jo Gale Miloge Tapaak Se
Ye Naye Mizaaz Shehar Hai Zara Fasle Se Mila Karo

 

Abhi Raah Me Kai Mod Hai Koi Ayega Koi Jayega
Tumhe Jisne Dil Se Bhula Diya Use Bhoolne Ki Dua Karo

 

Mujhe Ishthaar Si Lagti Hai ye Mohabbat Ki Kahaniyaan
Jo Kaha Nahi Wo Suna Karo Jo Suna Nahi Wo Kaha Karo

 

Kabhi Husn-E-Pardanashi Bhi Ho Zara Ashiqaana Libaas Me
Jo Mai Ban Savar Ke Kahi Chalu Mere Sath Tum Bhi Chala Karo

 

Ye Khizaan Ki Zard Si Shaam Me Jo Udaas Ped Ke Pass Hai
Ye Tumhare Ghar Ki Bahaar Hai Ise Aansuo Se Hara Karo

 

Nahi Be-Hizaab Wo Chand Sa Ki Nazar Ka Koi Asar Nahi
Use Itni Garmi-E-Shauk Se Badi Der Tak N Taka Karo


आँखों में रहा दिल में


आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफ़िर ने समन्दर नहीं देखा

 

बेवक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे
इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा

 

जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा

 

ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं
तुमने मिरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा

 

पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला
मैं मोम हूँ उसने मुझे छूकर नहीं देखा

 

क़ातिल के तरफ़दार का कहना है कि उसने
मक़तूल की गर्दन पे कभी सर नहीं देखा

 
 
Bashir Badr Ghazal In Hindi | Bashir Badr Ghazal

 

उसको आईना बनाया


उसको आईना बनाया, धूप का चेहरा मुझे
रास्ता फूलों का सबको, आग का दरिया मुझे

 

चाँद चेहरा, जुल्फ दरिया, बात खुशबू, दिल चमन
इन तुम्हें देकर ख़ुदा ने दे दिया क्या-क्या मुझे

 

जिस तरह वापस कोई ले जाए अपनी छुट्टियाँ
जाने वाला इस तरह से कर गया तन्हा मुझे

 

तुमने देखा है किसी मीरा को मंदिर में कभी
एक दिन उसने ख़ुदा से इस तरह माँगा मुझे

 

मेरी मुट्ठी में सुलगती रेत रखकर चल दिया
कितनी आवाज़ें दिया करता था ये दरिया मुझे

 

इस तरह साथ निभना है


इस तरह साथ निभना है दुश्वार सा
तू भी तलवार सा मैं भी तलवार सा

 

अपना रंगे ग़ज़ल उसके रुखसार सा
दिल चमकने लगा है रुख ए यार सा

 

अब है टूटा सा दिल खुद से बेज़ार सा
इस हवेली में लगता था दरबार सा

 

खूबसूरत सी पैरों में ज़ंजीर हो
घर में बैठा रहूँ मैं गिरफ्तार सा

 

मैं फरिश्तों के सुहबत के लायक नहीं
हम सफ़र कोई होता गुनहगार सा

 

गुड़िया गुड्डे को बेचा खरीदा गया
घर सजाया गया रात बाज़ार सा

 

बात क्या है कि मशहूर लोगों के घर
मौत का सोग होता है त्योहार सा

 

वो चांदनी का बदन


वो चांदनी का बदन ख़ुशबुओं का साया है
बहुत अज़ीज़ हमें है मगर पराया है

 

उतर भी आओ कभी आसमाँ के ज़ीने से
तुम्हें ख़ुदा ने हमारे लिये बनाया है

 

महक रही है ज़मीं चांदनी के फूलों से
ख़ुदा किसी की मुहब्बत पे मुस्कुराया है

 

उसे किसी की मुहब्बत का ऐतबार नहीं
उसे ज़माने ने शायद बहुत सताया है


तमाम उम्र मेरा दम उसके धुएँ से घुटा
वो इक चराग़ था मैंने उसे बुझाया है

 

सौ ख़ुलूस बातों में


सौ ख़ुलूस बातों में सब करम ख़्यालों में
बस ज़रा वफ़ा कम है तेरे शहर वालों में

 

पहली बार नज़रों ने चाँद बोलते देखा
हम जवाब क्या देते, खो गये सवालों में

 

रात तेरी यादों ने दिल को इस तरह छेड़ा
जैसे कोई चुटकी ले नर्म नर्म गालों में

 

यूँ किसी की आँखों में सुबह तक अभी थे हम
जिस तरह रहे शबनम फूल के प्यालों में

 

मेरी आँख के तारे अब न देख पाओगे
रात के मुसाफ़िर थे, खो गये उजालों में


Bashir Badr Shayari In Hindi | बशीर बद्र शायरी इन हिंदी

 

कभी यूँ भी आ मेरी आँख में
कभी यूँ भी आ मेरी आँख में, कि मेरी नज़र को ख़बर न हो
मुझे एक रात नवाज़ दे, मगर उसके बाद सहर न हो

 

वो बड़ा रहीमो-करीम है, मुझे ये सिफ़त भी अता करे
तुझे भूलने की दुआ करूँ तो मेरी दुआ में असर न हो

 

मेरे बाज़ुओं में थकी-थकी, अभी महवे- ख़्वाब है चाँदनी
न उठे सितारों की पालकी, अभी आहटों का गुज़र न हो

 

ये ग़ज़ल है जैसे हिरन की आँखों में पिछली रात की चाँदनी
न बुझे ख़राबे की रौशनी, कभी बे-चिराग़ ये घर न हो

 

कभी दिन की धूप में झूम कर, कभी शब के फूल को चूम कर
यूँ ही साथ-साथ चले सदा, कभी ख़त्म अपना सफ़र न हो

 

मेरे पास मेरे हबीब आ, ज़रा और दिल के करीब आ
तुझे धड़कनों में बसा लूँ मैं, कि बिछड़ने का कभी डर न हो

 

कहाँ आँसुओं की ये सौगात
कहाँ आँसुओं की ये सौगात होगी
नए लोग होंगे नयी बात होगी

 

मैं हर हाल में मुस्कराता रहूँगा
तुम्हारी मोहब्बत अगर साथ होगी

 

चराग़ों को आँखों में महफूज़ रखना
बड़ी दूर तक रात ही रात होगी

 

न तुम होश में हो न हम होश में है
चलो मयकदे में वहीं बात होगी

 

जहाँ वादियों में नए फूल आएँ
हमारी तुम्हारी मुलाक़ात होगी

 

सदाओं को अल्फाज़ मिलने न पायें
न बादल घिरेंगे न बरसात होगी

 

मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी

 

हमारा दिल सवेरे का


हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए
चराग़ों की तरह आँखें जलें जब शाम हो जाए

 

मैं ख़ुद भी एहतियातन उस गली से कम गुज़रता हूँ
कोई मासूम क्यों मेरे लिए बदनाम हो जाए

 

अजब हालात थे यूँ दिल का सौदा हो गया आख़िर
मोहब्बत की हवेली जिस तरह नीलाम हो जाए

 

समन्दर के सफ़र में इस तरह आवाज़ दो हमको
हवाएँ तेज़ हों और कश्तियों में शाम हो जाए

 

मुझे मालूम है उसका ठिकाना फिर कहाँ होगा
परिंदा आसमाँ छूने में जब नाकाम हो जाए

 

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए


दिल पे छाया रहा
दिल पे छाया रहा उमस की तरह
एक लम्हा था सौ बरस की तरह

 

वो मोहब्बत की तरह पिघलेगी
मैं भी मर जाऊँगा हवस की तरह

 

रात सर पर लिये हूँ जंगल में
रास्ते की ख़राब बस की तरह

 

आत्मा बेज़बान मैना है
माटी का तन क़फ़स की तरह

 

ख़ानक़ाहों में ख़ाक़ उड़ती है
उर्दू वालों के कैम्पस की तरह

 

मौत की वादियों से गुज़रूँगा
मैं पहाड़ों की एक बस की तरह


सरे राह कुछ भी कहा नहीं


सरे राह कुछ भी कहा नहीं, कभी उसके घर में गया नहीं
मैं जनम-जनम से उसी का हूँ, उसे आज तक ये पता नहीं

 

उसे पाक़ नज़रों से चूमना भी इबादतों में शुमार है
कोई फूल लाख क़रीब हो, कभी मैंने उसको छुआ नहीं

 

ये ख़ुदा की देन अज़ीब है, कि इसी का नाम नसीब है
जिसे तूने चाहा वो मिल गया, जिसे मैंने चाहा वो मिला नहीं

 

इसी शहर में कई साल से मेरे कुछ क़रीबी अज़ीज़ हैं
उन्हें मेरी कोई ख़बर नहीं, मुझे उनका कोई पता नहीं

 

याद अब ख़ुद को


याद अब ख़ुद को आ रहे हैं हम
कुछ दिनों तक ख़ुदा रहे हैं हम

 

आरज़ूओं के सुर्ख़ फूलों से
दिल की बस्ती सजा रहे हैं हम

 

आज तो अपनी ख़ामुशी में भी
तेरी आवाज़ पा रहे हैं हम

 

बात क्या है कि फिर ज़माने को
याद रह-रह के आ रहे हैं हम

 

जो कभी लौट कर नहीं आते
वो ज़माने बुला रहे हैं हम

 

ज़िंदगी अब तो सादगी से मिल
बाद सदियों के आ रहे हैं हम

 

अब हमें देख भी न पाओगे
इतने नज़दीक आ रहे हैं हम

 

ग़ज़लें अब तक शराब पीती थीं
नीम का रस पिला रहे हैं हम

 

धूप निकली है मुद्दतों के बाद
गीले जज़्बे सुखा रहे हैं हम

 

फ़िक्र की बेलिबास शाख़ों पर
फ़न की पत्ती लगा रहे हैं हम

 

सर्दियों में लिहाफ़ से चिमटे
चाँद तारों पे जा रहे हैं हम

 

ज़ीस्त की एक बर्फ़ी लड़की को
’नूरओ नामा’ पढ़ा रहे हैं हम

 

उस ने पूछा हमारे घर का पता
काफ़ी हाउस बुला रहे हैं हम

 

कंधे उचका के बात करने में
मुनफ़रद होते जा रहे हैं हम

 

चुस्त कपड़ों में ज़िस्म जाग पड़े
रूहो-दिल को सुला रहे हैं हम

 

कोई शोला है कोई जलती आग
जल रहे हैं जला रहे हैं हम

 

टेढ़ी तहज़ीब, टेढ़ी फ़िक्रो नज़र
टेढ़ी ग़ज़लें सुना रहे हैं हम

 

इस ज़ख़्मी प्यासे को
इस ज़ख़्मी प्यासे को इस तरह पिला देना
पानी से भरा शीशा पत्थर पे गिरा देना

 

इन पत्तों ने गर्मी भर साये में हमें रक्खा
अब टूट के गिरते हैं बेहतर है जला देना

 

छोटे क़दो-क़ामत पर मुमकिन है हँसे जंगल
एक पेड़ बहुत लम्बा है उसको गिरा देना

 

मुमकिन है कि इस तरह वहशत में कमी आये
इन सोये दरख़्तों में तुम आग लगा देना

 

अब दूसरों की ख़ुशियाँ चुभने लगीं आँखों में
ये बल्ब बहुत रोशन है इस को बुझा देना

 

बारीक कफ़न पहने तुम छत पे चली आओ
जब भीड़ सी लग जाये ये परदा उठा देना

 

वो जैसे ही दाख़िल हो सीने से मिरे लग कर
तुम कोट के कालर पर एक फूल लगा देना

 

इस बदमज़ा चाये में सब ज़ायके पायेंगे
इक सोने के चमचे को हर कप में चला देना

 

Bashir Badr Shayari In Hindi | बशीर बद्र शायरी इन हिंदी


फूल सा कुछ कलाम
फूल सा कुछ कलाम और सही
एक ग़ज़ल उस के नाम और सही

 

उस की ज़ुल्फ़ें बहुत घनेरी हैं
एक शब का क़याम और सही

 

ज़िन्दगी के उदास क़िस्से में
एक लड़की का नाम और सही

 

कुर्सियों को सुनाइये ग़ज़लें
क़त्ल की एक शाम और सही

 

कँपकँपाती है रात सीने में
ज़हर का एक जाम और सही

 

आया ही नहीं हमको


आया ही नहीं हमको आहिस्ता गुज़र जाना
शीशे का मुक़द्दर है टकरा के बिखर जाना


 

तारों की तरह शब के सीने में उतर जाना
आहट न हो क़दमों की इस तरह गुज़र जाना


 

नश्शे में सँभलने का फ़न यूँ ही नहीं आता
इन ज़ुल्फ़ों से सीखा है लहरा के सँवर जाना


 

भर जायेंगे आँखों में आँचल से बँधे बादल
याद आएगा जब गुल पर शबनम का बिखर जाना


 

हर मोड़ पे दो आँखें हम से यही कहती हैं
जिस तरह भी मुमकिन हो तुम लौट के घर जाना


 

पत्थर को मिरा साया, आईना सा चमका दे
जाना तो मिरा शीशा यूँ दर्द से भर जाना


 

ये चाँद सितारे तुम औरों के लिये रख लो
हमको यहीं जीना है, हमको यहीं मर जाना


 

जब टूट गया रिश्ता सर-सब्ज़ पहाड़ों से
फिर तेज हवा जाने किस को है किधर जाना


 

गुलों की तरह हमने
गुलों की तरह हमने ज़िन्दगी को इस क़दर जाना
किसी की ज़ुल्फ़ में एक रात सोना और बिखर जाना


 

अगर ऐसे गये तो ज़िन्दगी पर हर्फ़ आयेगा
हवाओं से लिपटना, तितलियों को चूम कर जाना


 

धुनक के रखा दिया था बादलों को जिन परिन्दों ने
उन्हें किस ने सिखाया अपने साये से भी डर जाना


 

कहाँ तक ये दिया बीमार कमरे की फ़िज़ा बदले
कभी तुम एक मुट्ठी धूप इन ताक़ों में भर जाना


 

इसी में आफ़िअत है घर में अपने चैन से बैठो
किसी की सिम्त जाना हो तो रस्ते में उतर जाना


 

किसे ख़बर थी तुझे


किसे ख़बर थी तुझे इस तरह सजाऊँगा
ज़माना देखेगा और मैं न देख पाऊँगा


 

हयातो-मौत फ़िराको-विसाल सब यकजा
मैं एक रात में कितने दिये जलाऊँगा


 

पला बढ़ा हूँ अभी तक इन्हीं अन्धेरों में
मैं तेज़ धूप से कैसे नज़र मिलाऊँगा


 

मिरे मिज़ाज की ये मादराना फ़ितरत है
सवेरे सारी अज़ीयत मैं भूल जाऊँगा


 

तुम एक पेड़ से बाबस्ता हो मगर मैं तो
हवा के साथ बहुत दूर दूर जाऊँगा


 

मिरा ये अहद है मैं आज शाम होने तक
जहाँ से रिज़्क लिखा है वहीं से लाऊँगा


 

कोई न जान सका
कोई न जान सका वो कहाँ से आया था
और उसने धूूप से बादल को क्यों मिलाया था


 

यह बात लोगों को शायद पसंद आयी नहीं
मकान छोटा था लेकिन बहुत सजाया था


 

वो अब वहाँ हैं जहाँ रास्ते नहीं जाते
मैं जिसके साथ यहाँ पिछले साल आया था


 

सुना है उस पे चहकने लगे परिंदे भी
वो एक पौधा जो हमने कभी लगाया था


 

चिराग़ डूब गए कपकपाये होंठों पर
किसी का हाथ हमारे लबों तक आया था


 

तमाम उम्र मेरा दम इसी धुएं में घुटा
वो एक चिराग़ था मैंने उसे बुझाया था


 


लोग टूट जाते हैं


लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में


 

और जाम टूटेंगे इस शराब-ख़ाने में
मौसमों के आने में मौसमों के जाने में


 

हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं
उम्र बीत जाती है दिल को दिल बनाने में


 

फ़ाख़्ता की मजबूरी ये भी कह नहीं सकती
कौन साँप रहता है उसके आशियाने में


 

दूसरी कोई लड़की ज़िन्दगी में आयेगी
कितनी देर लगती है उसको भूल जाने में


 

सर झुकाओगे तो
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जाएगा


 

हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा


 

कितनी सच्चाई से मुझ से ज़िन्दगी ने कह दिया
तू नहीं मेरा, तो कोई दूसरा हो जाएगा


 

मैं ख़ुदा का नाम लेकर पी रहा हूँ दोस्तो
ज़हर भी इसमें अगर होगा, दवा हो जाएगा


 

सब उसी के हैं हवा, ख़ुश्बू, ज़मीनो-आसमाँ
मैं जहाँ भी जाऊँगा, उसको पता हो जाएगा


 

आंसुओं से धुली


आंसुओं से धुली ख़ुशी की तरह
रिश्ते होते हैं शायरी की तरह


 

जब कभी बादलों में घिरता है
चाँद लगता है आदमी की तरह


 

किसी रोज़न किसी दरीचे से
सामने आओ रोशनी की तरह


 

सब नज़र का फ़रेब है वर्ना
कोई होता नहीं किसी की तरह


 

खूबसूरत, उदास, ख़ौफ़जदा
वो भी है बीसवीं सदी की तरह


 

जानता हूँ कि एक दिन मुझको
वक़्त बदलेगा डायरी की तरह


23


सूरज भी बँधा होगा देखो मेरे बाजू में
इस चाँद को भी रखना सोने के तराजू में


अब हमसे शराफ़त की उम्मीद न कर दुनिया
पानी नहीं मिल सकता तपती हुई बालू में


तारीक समन्दर के सीने में गुहर ढूँढो
जुगनू भी चमकते हैं बरसात के आँसू में


दिलदारो सनम झूटे सब दैरो-हरम छूटे
हम आ ही गए आख़िर दुनिया तेरे जादू में


ख़ाबीदा गुलाबों पर ये ओस बिछी कैसे
एहसास चमकता है उस्लूब की ख़ुशबू में




 

Bashir Badr Shayari In Hindi | बशीर बद्र शायरी इन हिंदी


24


परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता


बडे लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहां दरिया समन्दर में मिले, दरिया नहीं रहता


हजारों शेर मेरे सो गये कागज की कब्रों में
अजब मां हूं कोई बच्चा मेरा ज़िन्दा नहीं रहता


तुम्हारा शहर तो बिल्कुल नये अन्दाज वाला है
हमारे शहर में भी अब कोई हमसा नहीं रहता


मोहब्बत एक खुशबू है, हमेशा साथ रहती है
कोई इन्सान तन्हाई में भी कभी तन्हा नहीं रहता


कोई बादल हरे मौसम का फ़िर ऐलान करता है
ख़िज़ा के बाग में जब एक भी पत्ता नहीं रहता


25


अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जायेगा
मगर तुम्हारी तरह कौन मुझे चाहेगा


तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा
मगर वो आँखें हमारी कहाँ से लायेगा


ना जाने कब तेरे दिल पर नई सी दस्तक हो
मकान ख़ाली हुआ है तो कोई आयेगा


मैं अपनी राह में दीवार बन के बैठा हूँ
अगर वो आया तो किस रास्ते से आयेगा


तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है
तुम्हारे बाद ये मौसम बहुत सतायेगा


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ख़ुशबू की तरह आया, वो तेज हवाओं में
माँगा था जिसे हमने दिन-रात दुआओं में


तुम छत पे नहीं आए, मैं घर से नहीं निकला
ये चाँद बहुत भटका सावन की घटाओं में


इस शहर में इक लड़की बिल्कुल है ग़ज़ल जैसी
बिजली सी घटाओं में, ख़ुशबू सी हवाओं में


मौसम का इशारा है खुश रहने दो बच्चों को
मासूम मोहब्बत है फूलों की ख़ताओं में


भगवान ही भेजेंगे चावल से भरी थाली
मज़लूम परिन्दों की मासूम सभाओं में


दादा बड़े भोले थे सबसे यही कहते थे
कुछ ज़हर भी होता है अंग्रेज़ी दवाओं में


27
अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया
जिसको गले लगा लिया वो दूर हो गया


कागज में दब के मर गए कीड़े किताब के
दीवाना बे पढ़े-लिखे मशहूर हो गया


महलों में हमने कितने सितारे सजा दिये
लेकिन ज़मीं से चाँद बहुत दूर हो गया


तन्हाइयों ने तोड़ दी हम दोनों की अना
आईना बात करने पे मज़बूर हो गया


सुब्हे-विसाल पूछ रही है अज़ब सवाल
वो पास आ गया कि बहुत दूर हो गया


कुछ फल जरूर आयेंगे रोटी के पेड़ में
जिस दिन तेरा मतालबा मंज़ूर हो गया


 

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दालानों की धूप, छतों की शाम कहाँ
घर से बाहर घर जैसा आराम कहाँ


बाज़ारों की चहल-पहल से रोशन है
इन आँखों में मन्दिर जैसी शाम कहाँ


मैं उसको पहचान नहीं पाया तो क्या
याद उसे भी आया मेरा नाम कहाँ


चन्दा के बस्ते में सूखी रोटी है
काजू, किशमिश, पिस्ते और बादाम कहाँ


लोगों को सूरज का धोखा होता है
आँसू बनकर चमका मेरा नाम कहाँ


दिन भर सूरज किस का पीछा करता है
रोज़ पहाड़ी पर जाती है शाम कहाँ


29


लोग टूट जाते हैं, एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते, बस्तियाँ जलाने में


और जाम टूटेंगे, इस शराबख़ाने में
मौसमों के आने में, मौसमों के जाने में


हर धड़कते पत्थर को, लोग दिल समझते हैं
उम्र बीत जाती है, दिल को दिल बनाने में


फ़ाख़्ता की मजबूरी ,ये भी कह नहीं सकती
कौन साँप रखता है, उसके आशियाने में


दूसरी कोई लड़की, ज़िंदगी में आएगी
कितनी देर लगती है, उसको भूल जाने में


30


जहाँ पेड़ पर चार दाने लगे
हज़ारों तरफ़ से निशाने लगे


हुई शाम यादों के इक गाँव में
परिंदे उदासी के आने लगे


घड़ी दो घड़ी मुझको पलकों पे रख
यहाँ आते-आते ज़माने लगे


कभी बस्तियाँ दिल की यूँ भी बसीं
दुकानें खुलीं, कारख़ाने लगे


वहीं ज़र्द पत्तों का कालीन है
गुलों के जहाँ शामियाने लगे


पढाई-लिखाई का मौसम कहाँ
किताबों में ख़त आने-जाने लगे


31
उदासी का ये पत्थर आँसुओं से नम नहीं होता
हज़ारों जुगनुओं से भी अँधेरा कम नहीं होता


कभी बरसात में शादाब बेलें सूख जाती हैं
हरे पेड़ों के गिरने का कोई मौसम नहीं होता


बहुत से लोग दिल को इस तरह महफूज़ रखते हैं
कोई बारिश हो ये कागज़ ज़रा भी नम नहीं होता


बिछुड़ते वक़्त कोई बदगुमानी दिल में आ जाती
उसे भी ग़म नहीं होता मुझे भी ग़म नहीं होता


ये आँसू हैं इन्हें फूलों में शबनम की तरह रखना
ग़ज़ल एहसास है एहसास का मातम नहीं होता


32


सोये कहाँ थे आँखों ने तकिये भिगोए थे
हम भी कभी किसी के लिए ख़ूब रोए थे


अँगनाई में खड़े हुए बेरी के पेड़ से
वो लोग चलते वक़्त गले मिल के रोए थे


हर साल ज़र्द फूलों का इक क़ाफ़िला रुका
उसने जहाँ पे धूल अटे पाँव धोए थे


आँखों की कश्तियों में सफ़र कर रहे हैं वो
जिन दोस्तों ने दिल के सफ़ीने डुबोए थे


कल रात मैं था मेरे अलावा कोई न था
शैतान मर गया था फ़रिश्ते भी सोए थे


33


कौन आया रास्ते आईनाख़ाने हो गए
रात रौशन हो गई दिन भी सुहाने हो गए


क्यों हवेली के उजड़ने का मुझे अफ़सोस हो
सैकड़ों बेघर परिंदों के ठिकाने हो गए


ये भी मुमकिन है के उसने मुझको पहचाना न हो
अब उसे देखे हुए कितने ज़माने हो गए


जाओ उन कमरों के आईने उठाकर फेंक दो
वो अगर ये कह रहें हो हम पुराने हो गए


मेरी पलकों पर ये आँसू प्यार की तौहीन हैं
उनकी आँखों से गिरे मोती के दाने हो गए



34


आँखों में रहा दिल में उतरकर नहीं देखा,
कश्ती के मुसाफ़िर ने समन्दर नहीं देखा


बेवक़्त अगर जाऊँगा, सब चौंक पड़ेंगे
इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा


जिस दिन से चला हूँ मेरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा


ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं,
तुमने मेरा काँटों-भरा बिस्तर नहीं देखा


पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला
मैं मोम हूँ उसने मुझे छूकर नहीं देखा


35


जुगनू कोई सितारों की महफ़िल में खो गया
इतना न कर मलाल जो होना था हो गया


परवरदिगार जानता है तू दिलों का हाल
मैं जी न पाऊँगा जो उसे कुछ भी हो गया


अब उसको देखकर नहीं धड़केगा मेरा दिल
कहना के मुझको ये भी सबक याद हो गया


बादल उठा था सबको रुलाने के वास्ते
आँचल भिगो गया कहीं दामन भिगो गया


इक लड़की एक लड़के के काँधे पे सो गई
मैं उजली धुंधली यादों के कोहरे में खो गया


36


अगर यकीं नहीं आता तो आजमाए मुझे
वो आईना है तो फिर आईना दिखाए मुझे


अज़ब चिराग़ हूँ दिन-रात जलता रहता हूँ
मैं थक गया हूँ हवा से कहो बुझाए मुझे


मैं जिसकी आँख का आँसू था उसने क़द्र न की
बिखर गया हूँ तो अब रेत से उठाए मुझे


बहुत दिनों से मैं इन पत्थरों में पत्थर हूँ
कोई तो आये ज़रा देर को रुलाए मुझे


मैं चाहता हूँ के तुम ही मुझे इजाज़त दो
तुम्हारी तरह से कोई गले लगाए मुझे


37


मुझको अपनी नज़र ऐ ख़ुदा चाहिए
कुछ नहीं और इसके सिवा चाहिए


एक दिन तुझसे मिलने ज़रूर आऊँगा
ज़िन्दगी मुझको तेरा पता चाहिए


इस ज़माने ने लोगों को समझा दिया
तुमको आँखें नहीं, आईना चाहिए


तुमसे मेरी कोई दुश्मनी तो नहीं
सामने से हटो, रास्ता चाहिए


38


मुस्कुराती हुई धनक है वही
उस बदन में चमक दमक है वही


फूल कुम्हला गये उजालों के
साँवली शाम में नमक है वही


अब भी चेहरा चराग़ लगता है
बुझ गया है मगर चमक है वही


कोई शीशा ज़रूर टूटा है
गुनगुनाती हुई खनक है वही


प्यार किस का मिला है मिट्टी में
इस चमेली तले महक है वही


39


होंठों पे मुहब्बत के फ़साने नहीं आते
साहिल पे समुंदर के ख़ज़ाने नहीं आते


पलकें भी चमक उठती हैं सोते में हमारी
आँखों को अभी ख़्वाब छुपाने नहीं आते


दिल उजड़ी हुई इक सराय की तरह है
अब लोग यहाँ रात बिताने नहीं आते


उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में
फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते


इस शहर के बादल तेरी ज़ुल्फ़ों की तरह हैं
ये आग लगाते हैं बुझाने नहीं आते


क्या सोचकर आए हो मोहब्बत की गली में
जब नाज़ हसीनों के उठाने नहीं आते


अहबाब भी ग़ैरों की अदा सीख गये हैं
आते हैं मगर दिल को दुखाने नहीं आते


40


शबनम हूँ सुर्ख़ फूल पे बिखरा हुआ हूँ मैं
दिल मोम और धूप में बैठा हुआ हूँ मैं


कुछ देर बाद राख मिलेगी तुम्हें यहाँ
लौ बन के इस चराग़ से लिपटा हुआ हूँ मैं


दो सख़्त खुश्क़ रोटियां कब से लिए हुए
पानी के इन्तिज़ार में बैठा हुआ हूँ मैं


लाठी उठा के घाट पे जाने लगे हिरन
कैसे अजीब दौर में पैदा हुआ हूँ मैं


नस-नस में फैल जाऊँगा बीमार रात की
पलकों पे आज शाम से सिमटा हुआ हूँ मैं


औराक़ में छिपाती थी अक़्सर वो तितलियाँ
शायद किसी किताब में रक्खा हुआ हूँ मैं


दुनिया हैं बेपनाह तो भरपूर ज़िंदगी
दो औरतों के बीच में लेटा हुआ मैं


 

वो नही मिला तो


वो नही मिला तो मलाल क्या, जो गुज़र गया सो गुज़र गया
उसे याद करके ना दिल दुखा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया


 

ना गिला किया ना ख़फ़ा हुए, युँ ही रास्ते में जुदा हुए
ना तू बेवफ़ा ना मैं बेवफ़ा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया


 

तुझे एतबार-ओ-यकीं नहीं, नहीं दुनिया इतनी बुरी नहीं
ना मलाल कर, मेरे साथ आ, जो गुज़र गया सो गुज़र गया


 

वो वफ़ाएँ थीं, के जफ़ाएँ थीं, ये ना सोच किस की ख़ताएँ थीं
वो तेरा हैं, उसको गले लगा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया


 

वो ग़ज़ल की कोई किताब था , वो गुलों में एक गुलाब था
ज़रा देर का कोई ख़्वाब था, जो गुज़र गया सो गुज़र गया


 

मुझे पतझड़ों की कहानियाँ, न सुना सुना के उदास कर
तू खिज़ाँ का फूल है, मुस्कुरा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया


 

वो उदास धूप समेट कर कहीं वादियों में उतर चुका
उसे अब न दे मिरे दिल सदा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया


 

ये सफ़र भी किताना तवील है , यहाँ वक़्त कितना क़लील है
कहाँ लौट कर कोई आएगा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया


 

कोई फ़र्क शाह-ओ-गदा नहीं, कि यहाँ किसी को बक़ा नहीं
ये उजाड़ महलों की सुन सदा , जो गुज़र गया सो गुज़र गया


 

42


सुन ली जो ख़ुदा ने वो दुआ तुम तो नहीं हो
दरवाज़े पे दस्तक की सदा तुम तो नहीं हो


सिमटी हुई शर्माई हुई रात की रानी
सोई हुई कलियों की हया तुम तो नहीं हो


महसूस किया तुम को तो गीली हुई पलकें
भीगे हुये मौसम की अदा तुम तो नहीं हो


इन अजनबी राहों में नहीं कोई भी मेरा
किस ने मुझे यूँ अपना कहा तुम तो नहीं हो


43


गुलों की तरह हम ने ज़िंदगी को इस कदर जाना
किसी कि ज़ुल्फ़ में इक रात सोना और बिखर जाना


अगर ऐसे गए तो ज़िंदगी पर हर्फ़ आयेगा
हवाओं से लिपटना तितलियों को चूम कर जाना


धुनक के रख दिया था बादलों को जिन परिंदों ने
उन्हें किसने सिखाया अपने साये से भी डर जाना


कहाँ तक ये दिया बीमार कमरे कि फ़िज़ां बदले
कभी तुम एक मुट्ठी धुप इन ताकों में भर जाना


इसी में आफिअत है घर में अपने चैन से बैठो
किसी कि स्मित जाना हो तो रस्ते में उतर जाना


44


है अजीब शहर कि ज़िंदगी, न सफ़र रहा न क़याम है
कहीं कारोबार सी दोपहर, कहीं बदमिज़ाज सी शाम है


कहाँ अब दुआओं कि बरकतें, वो नसीहतें, वो हिदायतें
ये ज़रूरतों का ख़ुलूस है, या मुतालबों का सलाम है


यूँ ही रोज़ मिलने की आरज़ू बड़ी रख रखाव की गुफ्तगू
ये शराफ़ातें नहीं बे ग़रज़ उसे आपसे कोई काम है


वो दिलों में आग लगायेगा मैं दिलों की आग बुझाऊंगा
उसे अपने काम से काम है मुझे अपने काम से काम है


न उदास हो न मलाल कर, किसी बात का न ख़याल कर
कई साल बाद मिले है हम, तिरे नाम आज की शाम है


कोई नग्मा धूप के गॉँव सा, कोई नग़मा शाम की छाँव सा
ज़रा इन परिंदों से पूछना ये कलाम किस का कलाम है



45


मै कब कहता हूँ वो अच्छा बहुत है
मगर उसने मुझे चाहा बहुत है


खुदा इस शहर को महफूज़ रखे
ये बच्चों की तरह हँसता बहुत है


मै तुझसे रोज़ मिलना चाहता हूँ
मगर इस राह में खतरा बहुत है


मेरा दिल बारिशों में फूल जैसा
ये बच्चा रात में रोता बहुत है


इसे आंसू का एक कतरा न समझो
कुँआ है और ये गहरा बहुत है


उसे शोहरत ने तनहा कर दिया है
समंदर है मगर प्यासा बहुत है


मै एक लम्हे में सदियाँ देखता हूँ
तुम्हारे साथ एक लम्हा बहुत है


मेरा हँसना ज़रूरी हो गया है
यहाँ हर शख्स संजीदा बहुत है


 

46


वो शाख़ है न फूल, अगर तितलियाँ न हों
वो घर भी कोई घर है जहाँ बच्चियाँ न हों


पलकों से आँसुओं की महक आनी चाहिए
ख़ाली है आसमान अगर बदलियाँ न हों


दुश्मन को भी ख़ुदा कभी ऐसा मकाँ न दे
ताज़ा हवा की जिसमें कहीं खिड़कियाँ न हों


मै पूछता हूँ मेरी गली में वो आए क्यों
जिस डाकिए के पास तेरी चिट्ठियाँ न हों


47


ऐसा लगता है ज़िन्दगी तुम हो
अजनबी जैसे अजनबी तुम हो


अब कोई आरज़ू नहीं बाकी
जुस्तजू मेरी आख़िरी तुम हो


मैं ज़मीं पर घना अँधेरा हूँ
आसमानों की चांदनी तुम हो


दोस्तों से वफ़ा की उम्मीदें
किस ज़माने के आदमी तुम हो


 

48
भीगी हुई आँखों का ये मंज़र न मिलेगा
घर छोड़ के मत जाओ कहीं घर न मिलेगा


फिर याद बहुत आयेगी ज़ुल्फ़ों की घनी शाम
जब धूप में साया कोई सर पर न मिलेगा


आँसू को कभी ओस का क़तरा न समझना
ऐसा तुम्हें चाहत का समुंदर न मिलेगा


इस ख़्वाब के माहौल में बे-ख़्वाब हैं आँखें
बाज़ार में ऐसा कोई ज़ेवर न मिलेगा


ये सोच लो अब आख़िरी साया है मुहब्बत
इस दर से उठोगे तो कोई दर न मिलेगा


 

49
अभी इस तरफ़ न निगाह कर मैं ग़ज़ल की पलकें सँवार लूँ
मेरा लफ़्ज़-लफ़्ज़ हो आईना तुझे आईने में उतार लूँ


मैं तमाम दिन का थका हुआ, तू तमाम शब का जगा हुआ
ज़रा ठहर जा इसी मोड़ पर, तेरे साथ शाम गुज़ार लूँ


अगर आसमाँ की नुमाइशों में मुझे भी इज़्न-ए-क़याम[1] हो
तो मैं मोतियों की दुकान से तेरी बालियाँ तेरे हार लूँ


कई अजनबी तेरी राह के मेरे पास से यूँ गुज़र गये
जिन्हें देख कर ये तड़प हुई तेरा नाम लेके पुकार लूँ


 

50
भूल शायद बहुत बड़ी कर ली
दिल ने दुनिया से दोस्ती कर ली


तुम मुहब्बत को खेल कहते हो
हम ने बर्बाद ज़िन्दगी कर ली


उस ने देखा बड़ी इनायत से
आँखों आँखों में बात भी कर ली


आशिक़ी में बहुत ज़रूरी है
बेवफ़ाई कभी कभी कर ली


हम नहीं जानते चिराग़ों ने
क्यों अंधेरों से दोस्ती कर ली


धड़कनें दफ़्न हो गई होंगी
दिल में दीवार क्यों खड़ी कर ली


 

51
दुआ करो कि ये पौधा सदा हरा ही लगे
उदासियों से भी चेहरा खिला-खिला ही लगे


ये चाँद तारों का आँचल उसी का हिस्सा है
कोई जो दूसरा ओढे़ तो दूसरा ही लगे


नहीं है मेरे मुक़द्दर में रौशनी न सही
ये खिड़की खोलो ज़रा सुबह की हवा ही लगे


अजीब शख़्स है नाराज़ होके हंसता है
मैं चाहता हूँ ख़फ़ा हो तो वो ख़फ़ा ही लगे


52
गाँव मिट जायेगा शहर जल जायेगा
ज़िन्दगी तेरा चेहरा बदल जायेगा


कुछ लिखो मर्सिया मसनवी या ग़ज़ल
कोई काग़ज़ हो पानी में गल जायेगा


अब उसी दिन लिखूँगा दुखों की ग़ज़ल
जब मेरा हाथ लोहे में ढल जायेगा


मैं अगर मुस्कुरा कर उन्हें देख लूँ
क़ातिलों का इरादा बदल जायेगा


आज सूरज का रुख़ है हमारी तरफ़
ये बदन मोम का है पिघल जायेगा


 

कहीं चांद राहों में


कहीं चांद राहों में खो गया कहीं चांदनी भी भटक गई
मैं चराग़ वो भी बुझा हुआ मेरी रात कैसे चमक गई


 

मेरी दास्ताँ का उरूज था तेरी नर्म पलकों की छाँव में
मेरे साथ था तुझे जागना तेरी आँख कैसे झपक गई


 

कभी हम मिले तो भी क्या मिले वही दूरियाँ वही फ़ासले
न कभी हमारे क़दम बढ़े न कभी तुम्हारी झिझक गई


 

मुझे पदने वाला पढ़े भी क्या मुझे लिखने वाला लिखे भी क्या
जहाँ नाम मेरा लिखा गया वहां रोशनाई उलट गई


 

तुझे भूल जाने की कोशिशें कभी क़ामयाब न हो सकीं
तेरी याद शाख़-ए-गुलाब है जो हवा चली तो लचक गई





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