John Elia Shayari In Hindi | जौन एलिया की शायरी


John Elia Shayari In Hindi | जौन एलिया की शायरी


 

मेरी बाँहों में बहकने की सज़ा भी सुन ले
अब बहुत देर में आज़ाद करूँगा तुझ को



सीना दहक रहा हो तो


ना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई
क्यूँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई


साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं
रिश्तों में ढूँढता है तो ढूँढा करे कोई


तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं
ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई


दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी
अब मुझ को एतिमाद की दावत न दे कोई


मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हूँ ख़राब
मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई


ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है
ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई


हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ
आख़िर मिरे मिज़ाज में क्यूँ दख़्ल दे कोई


इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र
काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई




मैं रहा उम्र भर जुदा ख़ुद से
याद मैं ख़ुद को उम्र भर आया


 

अब किसी से मिरा हिसाब नहीं


अब किसी से मिरा हिसाब नहीं
मेरी आँखों में कोई ख़्वाब नहीं


ख़ून के घूँट पी रहा हूँ मैं
ये मिरा ख़ून है शराब नहीं


मैं शराबी हूँ मेरी आस न छीन
तू मिरी आस है सराब नहीं


नोच फेंके लबों से मैं ने सवाल
ताक़त-ए-शोख़ी-ए-जवाब नहीं


अब तो पंजाब भी नहीं पंजाब
और ख़ुद जैसा अब दो-आब नहीं


ग़म अबद का नहीं है आन का है
और इस का कोई हिसाब नहीं


बूदश इक रू है एक रू या'नी
इस की फ़ितरत में इंक़लाब नहीं




अपना रिश्ता ज़मीं से ही रक्खो
कुछ नहीं आसमान में रक्खा



03


महक उठा है आँगन इस ख़बर से
वो ख़ुशबू लौट आई है सफ़र से


जुदाई ने उसे देखा सर-ए-बाम
दरीचे पर शफ़क़ के रंग बरसे


मैं इस दीवार पर चढ़ तो गया था
उतारे कौन अब दीवार पर से


गिला है एक गली से शहर-ए-दिल की
मैं लड़ता फिर रहा हूँ शहर भर से


उसे देखे ज़माने भर का ये चाँद
हमारी चाँदनी छाए तो तरसे


मेरे मानन गुज़रा कर मेरी जान
कभी तू खुद भी अपनी रहगुज़र से




ज़िंदगी किस तरह बसर होगी
दिल नहीं लग रहा मोहब्बत में


 

04


अजब इक शोर सा बरपा है कहीं
कोई खामोश हो गया है कहीं


है कुछ ऐसा के जैसे ये सब कुछ
अब से पहले भी हो चुका है कहीं


जो यहाँ से कहीं न जाता था
वो यहाँ से चला गया है कहीं


तुझ को क्या हो गया, के चीजों को
कहीं रखता है, ढूंढता है कहीं


तू मुझे ढूंढ़, मैं तुझे ढुंढू
कोई हम में से रह गया है कहीं


इस कमरे से हो के कोई विदा
इस कमरे में छुप गया है कहीं



 

John Elia Shayari In Hindi | जौन एलिया की शायरी



बहुत नज़दीक आती जा रही हो
बिछड़ने का इरादा कर लिया क्या


 

05


दिल जो है आग लगा दूँ उस को
और फिर ख़ुद ही हवा दूँ उस को


जो भी है उस को गँवा बैठा है
मैं भला कैसे गँवा दूँ उस को


तुझ गुमाँ पर जो इमारत की थी
सोचता हूँ कि मैं ढा दूँ उस को


जिस्म में आग लगा दूँ उस के
और फिर ख़ुद ही बुझा दूँ उस को


हिज्र की नज़्र तो देनी है उसे
सोचता हूँ कि भुला दूँ उस को


जो नहीं है मिरे दिल की दुनिया
क्यूँ न मैं 'जौन' मिटा दूँ उस को




इलाज ये है कि मजबूर कर दिया जाऊँ
वरना यूँ तो किसी की नहीं सुनी मैंने



06


यादों का हिसाब रख रहा हूँ
सीने में अज़ाब रख रहा हूँ


तुम कुछ कहे जाओ क्या कहूँ मैं
बस दिल में जवाब रख रहा हूँ


दामन में किए हैं जमा गिर्दाब
जेबों में हबाब रख रहा हूँ


आएगा वो नख़वती सो मैं भी
कमरे को ख़राब रख रहा हूँ


तुम पर मैं सहीफ़ा-हा-ए-कोहना
इक ताज़ा किताब रख रहा हूँ




कौन इस घर की देख-भाल करे
रोज़ इक चीज़ टूट जाती है



07


शर्मिंदगी है हम को बहुत हम मिले तुम्हें
तुम सर-ब-सर ख़ुशी थे मगर ग़म मिले तुम्हें


मैं अपने आप में न मिला इस का ग़म नहीं
ग़म तो ये है के तुम भी बहुत कम मिले तुम्हें


है जो हमारा एक हिसाब उस हिसाब से
आती है हम को शर्म के पैहम मिले तुम्हें


तुम को जहान-ए-शौक़-ओ-तमन्ना में क्या मिला
हम भी मिले तो दरहम ओ बरहम मिले तुम्हें


अब अपने तौर ही में नहीं तुम सो काश के
ख़ुद में ख़ुद अपना तौर कोई दम मिले तुम्हें


इस शहर-ए-हीला-जू में जो महरम मिले मुझे
फ़रियाद जान-ए-जाँ वही महरम मिले तुम्हें


देता हूँ तुम को ख़ुश्की-ए-मिज़गाँ की मैं दुआ
मतलब ये है के दामन-ए-पुर-नम मिले तुम्हें


मैं उन में आज तक कभी पाया नहीं गया
जानाँ जो मेरे शौक़ के आलम मिले तुम्हें


तुम ने हमारे दिल में बहुत दिन सफ़र किया
शर्मिंदा हैं के उस में बहुत ख़म मिले तुम्हें


यूँ हो के और ही कोई हव्वा मिले मुझे
हो यूँ के और ही कोई आदम मिले तुम्हें




अपने सब यार काम कर रहे हैं
और हम हैं कि नाम कर रहे हैं


 

08


कोई दम भी मैं कब अंदर रहा हूँ
लिए हैं साँस और बाहर रहा हूँ


धुएं में साँस हैं साँसों में पल हैं
मैं रौशन-दान तक बस मर रहा हूँ


फ़ना हर दम मुझे गिनती रही है
मैं इक दम का था और दिन भर रहा हूँ


ज़रा इक साँस रोका तो लगा यूँ
के इतनी देर अपने घर रहा हूँ


ब-जुज़ अपने मयस्सर है मुझे क्या
सो ख़ुद से अपनी जेबें भर रहा हूँ


हमेशा ज़ख़्म पहुँचे हैं मुझी को
हमेशा मैं पस-ए-लश्कर रहा हूँ


लिटा दे नींद के बिस्तर पे ऐ रात
मैं दिन भर अपनी पलकों पर रहा हूँ




शौक का रंग बुझ गया , याद के ज़ख्म भर गए
क्या मेरी फसल हो चुकी, क्या मेरे दिन गुज़र गए?



09


हमारे ज़ख़्म-ए-तमन्ना पुराने हो गए हैं
के उस गली में गए अब ज़माने हो गए हैं


तुम अपने चाहने वालों की बात मत सुनियो
तुम्हारे चाहने वाले दिवाने हो गए हैं


वो ज़ुल्फ़ धूप में फ़ुर्क़त की आई है जब याद
तो बादल आए हैं और शामियाने हो गए हैं


जो अपने तौर से हम ने कभी गुज़ारे थे
वो सुब्ह ओ शाम तो जैसे फ़साने हो गए हैं


अजब महक थी मेरे गुल तेरे शबिस्ताँ की
सो बुलबुलों के वहाँ आशियाने हो गए हैं


हमारे बाद जो आएँ उन्हें मुबारक हो
जहाँ थे कुंज वहाँ कार-ख़ाने हो गए हैं





                                तमन्ना कई थे, आज दिल में उनके लिए 

लेकिन वो आज न आये मुझे मिलने के लिए


 

10


अब जुनूँ कब किसी के बस में है
उसकी ख़ुशबू नफ़स-नफ़स में है


हाल उस सैद का सुनाईए क्या
जिसका सैयाद ख़ुद क़फ़स में है


क्या है गर ज़िन्दगी का बस न चला
ज़िन्दगी कब किसी के बस में है


ग़ैर से रहियो तू ज़रा होशियार
वो तेरे जिस्म की हवस में है


बाशिकस्ता बड़ा हुआ हूँ मगर
दिल किसी नग़्मा-ए-जरस में है


'जॉन' हम सबकी दस्त-रस में है
वो भला किसकी दस्त-रस में है




काम करने का जोश न रहा
उनके बिना कोई होश न रहा



11


बे-क़रारी सी बे-क़रारी है
वस्ल है और फ़िराक़ तारी है


जो गुज़ारी ना जा सकी हम से
हम ने वो ज़िंदगी गुज़ारी है


निघरे क्या हुए कि लोगों पर
अपना साया भी अब तो भारी है


बिन तुम्हारे कभी नहीं आई
क्या मिरी नींद भी तुम्हारी है


आप में कैसे आऊँ मैं तुझ बिन
साँस जो चल रही है आरी है


उस से कहियो कि दिल की गलियों में
रात दिन तेरी इंतिज़ारी है


हिज्र हो या विसाल हो कुछ हो
हम हैं और उस की यादगारी है


इक महक सम्त-ए-दिल से आई थी
मैं ये समझा तिरी सवारी है


हादसों का हिसाब है अपना
वर्ना हर आन सब की बारी है


ख़ुश रहे तू कि ज़िंदगी अपनी
उम्र भर की उमीद-वारी है




कैसे समझाऊ उन्हें की वो मेरी ज़िन्दगी है
मेरी ज़िन्दगी को कैसे समझाऊ के मोहब्बत मेरी बंदगी है



12


सारे रिश्ते तबाह कर आया
दिल-ए-बर्बाद अपने घर आया


आख़िरश ख़ून थूकने से मियाँ
बात में तेरी क्या असर आया


था ख़बर में ज़ियाँ दिल ओ जाँ का
हर तरफ़ से मैं बे-ख़बर आया


अब यहाँ होश में कभी अपने
नहीं आऊँगा मैं अगर आया


मैं रहा उम्र भर जुदा ख़ुद से
याद मैं ख़ुद को उम्र भर आया


वो जो दिल नाम का था एक नफ़र
आज मैं इस से भी मुकर आया


मुद्दतों बाद घर गया था मैं
जाते ही मैं वहाँ से डर आया



 

John Elia Shayari In Hindi | जौन एलिया की शायरी



सोचता हूँ कि उस की याद आख़िर
अब किसे रात भर जगाती है


 

13


तंग आग़ोश में आबाद करूँगा तुझ को
हूँ बहुत शाद कि नाशाद करूँगा तुझ को


फ़िक्र-ए-ईजाद में गुम हूँ मुझे ग़ाफ़िल न समझ
अपने अंदाज़ पर ईजाद करूँगा तुझ को


नश्शा है राह की दूरी का कि हमराह है तू
जाने किस शहर में आबाद करूँगा तुझ को


मेरी बाँहों में बहकने की सज़ा भी सुन ले
अब बहुत देर में आज़ाद करूँगा तुझ को


मैं कि रहता हूँ ब-सद-नाज़ गुरेज़ाँ तुझ से
तू न होगा तो बहुत याद करूँगा तुझ को




किस लिए देखती हो आईना
तुम तो ख़ुद से भी ख़ूबसूरत हो



14


कितने ऐश उड़ाते होंगे कितने इतराते होंगे
जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे


उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा,
यूँ ही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे


बंद रहे जिन का दरवाज़ा ऐसे घरों की मत पूछो,
दीवारें गिर जाती होंगी आँगन रह जाते होंगे


मेरी साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएंगे,
यानी मेरे बाद भी यानी साँस लिये जाते होंगे


यारो कुछ तो बात बताओ उस की क़यामत बाहों की,
वो जो सिमटते होंगे इन में वो तो मर जाते होंगे



 

अब मिरी कोई ज़िंदगी ही नहीं
अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या



15


अजब हालत हमारी हो गई है
ये दुनिया अब तुम्हारी हो गई है


सुख़न मेरा उदासी है सर-ए-शाम
जो ख़ामोशी पे तारी हो गई है


बहुत ही ख़ुश है दिल अपने किए पर
ज़माने-भर में ख़्वारी हो गई है


वो नाज़ुक-लब है अब जाने ही वाला
मिरी आवाज़ भारी हो गई है


दिल अब दुनिया पे लानत कर कि इस की
बहुत ख़िदमत-गुज़ारी हो गई है


यक़ीं मा'ज़ूर है अब और गुमाँ भी
बड़ी बे-रोज़-गारी हो गई है


वो इक बाद-ए-शुमाली-रंग जो थी
शमीम उस की सवारी हो गई है


मिरे पास आ के ख़ंजर भोंक दे तू
बहुत नेज़ा-गुज़ारी हो गई है



John Elia Shayari In Hindi | जौन एलिया की शायरी



बिन तुम्हारे कभी नहीं आई
क्या मिरी नींद भी तुम्हारी है



16


ख़ामोशी कह रही है कान में क्या
आ रहा है मेरे गुमान में क्या


अब मुझे कोई टोकता भी नहीं
यही होता है खानदान में क्या


बोलते क्यों नहीं मेरे हक़ में
आबले पड़ गये ज़बान में क्या


मेरी हर बात बे-असर ही रही
नुक़्स है कुछ मेरे बयान में क्या


वो मिले तो ये, पूछना है मुझे
अब भी हूँ मैं तेरी अमान में क्या


शाम ही से, दुकान-ए-दीद है बंद
नहीं नुकसान तक दुकान में क्या


यूं जो तकता है आसमान को तू
कोई रहता है आसमान में क्या


ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता
इक ही शख़्स था जहान में क्या


 

आज मुझ को बहुत बुरा कह कर
आप ने नाम तो लिया मेरा



17


दिल ने वफ़ा के नाम पर कार-ए-जफ़ा नहीं किया
ख़ुद को हलाक कर लिया ख़ुद को फ़िदा नहीं किया


कैसे कहें के तुझ को भी हमसे है वास्ता कोई
तूने तो हमसे आज तक कोई गिला नहीं किया


तू भी किसी के बाब में अहद-शिकन हो ग़ालिबन
मैं ने भी एक शख़्स का क़र्ज़ अदा नहीं किया


जो भी हो तुम पे मौतरिज़ उस को यही जवाब दो
आप बहुत शरीफ़ हैं आप ने क्या नहीं किया


जिस को भी शेख़-ओ-शाह ने हुक्म-ए-ख़ुदा दिया क़रार
हमने नहीं किया वो काम हाँ बा-ख़ुदा नहीं किया


निस्बत-ए-इल्म है बहुत हाकिम-ए-वक़्त को अज़ीज़
उस ने तो कार-ए-जेहन भी बे-उलामा नहीं किया



John Elia Shayari In Hindi | जौन एलिया की शायरी



मुझ को आदत है रूठ जाने की
आप मुझ को मना लिया कीजे


 

18


दिल की तकलीफ़ कम नहीं करते
अब कोई शिकवा हम नहीं करते


जान-ए-जाँ तुझ को अब तिरी ख़ातिर
याद हम कोई दम नहीं करते


दूसरी हार की हवस है सो हम
सर-ए-तस्लीम ख़म नहीं करते


वो भी पढ़ता नहीं है अब दिल से
हम भी नाले को नम नहीं करते


जुर्म में हम कमी करें भी तो क्यूँ
तुम सज़ा भी तो कम नहीं करते


 

John Elia Shayari In Hindi | जौन एलिया की शायरी



अब तो हर बात याद रहती है
ग़ालिबन मैं किसी को भूल गया


 

19


एक हुनर है जो कर गया हूँ मैं
सब के दिल से उतर गया हूँ मैं


कैसे अपनी हँसी को ज़ब्त करूँ
सुन रहा हूँ के घर गया हूँ मैं


क्या बताऊँ के मर नहीं पाता
जीते जी जब से मर गया हूँ मैं


अब है बस अपना सामना दरपेश
हर किसी से गुज़र गया हूँ मैं


वो ही नाज़-ओ-अदा, वो ही ग़मज़े
सर-ब-सर आप पर गया हूँ मैं


अजब इल्ज़ाम हूँ ज़माने का
के यहाँ सब के सर गया हूँ मैं


कभी खुद तक पहुँच नहीं पाया
जब के वाँ उम्र भर गया हूँ मैं


तुम से जानां मिला हूँ जिस दिन से
बे-तरह, खुद से डर गया हूँ मैं


कू–ए–जानां में सोग बरपा है
के अचानक, सुधर गया हूँ मैं




ज़िंदगी एक फ़न है लम्हों को
अपने अंदाज़ से गँवाने का


 

20


तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो
जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो


तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू
और इतने ही बेमुरव्वत हो


तुम हो पहलू में पर क़रार नहीं
यानी ऐसा है जैसे फुरक़त हो


है मेरी आरज़ू के मेरे सिवा
तुम्हें सब शायरों से वहशत हो


किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ
तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो


किसलिए देखते हो आईना
तुम तो ख़ुद से भी ख़ूबसूरत हो


दास्ताँ ख़त्म होने वाली है
तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो



 

मुझे अब तुम से डर लगने लगा है
तुम्हें मुझ से मोहब्बत हो गई क्या


 

21


जी हाँ जी में वो जल रही होगी
चाँदनी में टहल रही होगी


चाँद ने तान ली है चादर-ए-अब्र
अब वो कपड़े बदल रही होगी


सो गई होगी वो शफ़क़-अंदाम
सब्ज़ क़िंदील जल रही होगी


सुर्ख़ और सब्ज़ वादियों की तरफ़
वो मिरे साथ चल रही होगी


चढ़ते चढ़ते किसी पहाड़ी पर
अब वो करवट बदल रही होगी


पेड़ की छाल से रगड़ खा कर
वो तने से फिसल रही होगी


नील-गूँ झील नाफ़ तक पहने
संदलीं जिस्म मल रही होगी


हो के वो ख़्वाब-ए-ऐश से बेदार
कितनी ही देर शल रही होगी

 

John Elia Shayari In Hindi | जौन एलिया की शायरी


22


हर धड़कन हैजानी थी हर ख़ामोशी तूफ़ानी थी
फिर भी मोहब्बत सिर्फ़ मुसलसल मिलने की आसानी थी


जिस दिन उस से बात हुई थी उस दिन भी बे-कैफ़ था मैं
जिस दिन उस का ख़त आया है उस दिन भी वीरानी थी


जब उस ने मुझ से ये कहा था इश्क़ रिफ़ाक़त ही तो नहीं
तब मैं ने हर शख़्स की सूरत मुश्किल से पहचानी थी


जिस दिन वो मिलने आई है उस दिन की रूदाद ये है
उस का बलाउज़ नारंजी था उस की सारी धानी थी


उलझन सी होने लगती थी मुझ को अक्सर और वो यूँ
मेरा मिज़ाज-ए-इश्क़ था शहरी उस की वफ़ा दहक़ानी थी



 

जुर्म में हम कमी करें भी तो क्यूँ
तुम सज़ा भी तो कम नहीं करते


  

23


अपनी मंज़िल का रास्ता भेजो
जान हम को वहाँ बुला भेजो


क्या हमारा नहीं रहा सावन
ज़ुल्फ़ याँ भी कोई घटा भेजो


नई कलियाँ जो अब खिली हैं वहाँ
उन की ख़ुश्बू को इक ज़रा भेजो


हम न जीते हैं और न मरते हैं
दर्द भेजो न तुम दवा भेजो


धूल उड़ती है जो उस आँगन में
उस को भेजो सबा सबा भेजो


ऐ फकीरो गली के उस गुल की
तुम हमें अपनी ख़ाक-ए-पा भेजो


शफ़क़-ए-शाम-ए-हिज्र के हाथों
अपनी उतरी हुई क़बा भेजो


कुछ तो रिश्ता है तुम से कम-बख़्तों
कुछ नहीं कोई बद-दुआ' भेजो

 

John Elia Shayari In Hindi | जौन एलिया की शायरी



कमबख्त यह दिल है कि मानता नहीं
यह क्या मजबूरी हैं उनके बिना काम बनता नहीं


 

24


रूह प्यासी कहाँ से आती है
ये उदासी कहाँ से आती है


है वो यक-सर सुपुर्दगी तो भला
बद-हवासी कहाँ से आती है


वो हम-आग़ोश है तो फिर दिल में
ना-शनासी कहाँ से आती है


एक ज़िंदान-ए-बे-दिली और शाम
ये सबा सी कहाँ से आती है


तू है पहलू में फिर तिरी ख़ुश्बू
हो के बासी कहाँ से आती है


दिल है शब-सोख़्ता सिवाए उम्मीद
तू निदा सी कहाँ से आती है


मैं हूँ तुझ में और आस हूँ तेरी
तो निरासी कहाँ से आती है




काश उनको भी मेरी याद सताये
यह मोहब्बत का रोग उन्हें जलाये


 

25


हिज्र की आँखों से आँखें तो मिलाते जाइए
हिज्र में करना है क्या ये तो बताते जाइए


बन के ख़ुश्बू की उदासी रहिए दिल के बाग़ में
दूर होते जाइए नज़दीक आते जाइए


जाते जाते आप इतना काम तो कीजे मिरा
याद का सारा सर-ओ-सामाँ जलाते जाइए


रह गई उम्मीद तो बरबाद हो जाऊँगा मैं
जाइए तो फिर मुझे सच-मुच भुलाते जाइए


ज़िंदगी की अंजुमन का बस यही दस्तूर है
बढ़ के मिलिए और मिल कर दूर जाते जाइए


आख़िरश रिश्ता तो हम में इक ख़ुशी इक ग़म का था
मुस्कुराते जाइए आँसू बहाते जाइए


वो गली है इक शराबी चश्म-ए-काफ़िर की गली
उस गली में जाइए तो लड़खड़ाते जाइए


आप को जब मुझ से शिकवा ही नहीं कोई तो फिर
आग ही दिल में लगानी है लगाते जाइए


कूच है ख़्वाबों से ताबीरों की सम्तों में तो फिर
जाइए पर दम-ब-दम बरबाद जाते जाइए


आप का मेहमान हूँ मैं आप मेरे मेज़बान
सो मुझे ज़हर-ए-मुरव्वत तो पिलाते जाइए


है सर-ए-शब और मिरे घर में नहीं कोई चराग़
आग तो इस घर में जानाना लगाते जाइए



 

यूँ जो तकता है आसमान को तू
कोई रहता है आसमान में क्या?



 

गँवाई किस की तमन्ना में ज़िंदगी मैं ने
वो कौन है जिसे देखा नहीं कभी मैंने



 

कोई मुझ तक पहुँच नहीं पाता
इतना आसान है पता मेरा



 

यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का
वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे



 

नया इक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम
बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँ करें हम



 

उस के होंटों पे रख के होंट अपने
बात ही हम तमाम कर रहे हैं



 

मैं जो हूँ 'जौन-एलिया' हूँ जनाब
इस का बेहद लिहाज़ कीजिएगा



 

चाँद ने तान ली है चादर-ए-अब्र
अब वो कपड़े बदल रही होगी



 

हो रहा हूँ मैं किस तरह बर्बाद
देखने वाले हाथ मलते हैं



John Elia Shayari In Hindi | जौन एलिया की शायरी


 

कौन से शौक़ किस हवस का नहीं
दिल मिरी जान तेरे बस का नहीं




रोया हूँ तो अपने दोस्तों में 

पर तुझ से तो हँस के ही मिला हूँ



 

जिस्म में आग लगा दूँ उस के
और फिर ख़ुद ही बुझा दूँ उस को



 

पड़ी रहने दो इंसानों की लाशें
ज़मीं का बोझ हल्का क्यूँ करें हम

 


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    John Elia Shayari In Hindi | जौन एलिया की शायरी John Elia Shayari In Hindi | जौन एलिया की शायरी Reviewed by Feel neel on November 24, 2019 Rating: 5

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