Mirza Ghalib Shayari In Hindi | मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी

 

Hai Aur Bhi Duniya Me



हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और


Hai Aur Bhi Duniya Me Sukhanwar Bahut Achche
Kehte Hai Ki "Ghalib" Ka Hai Andaaz-e-Bayan Aur - Mirza Ghalib 


Urdu and hindi shayari – Galib – Mirza Galib ki shayarim - Hazaaron Khwahishe Aisi Ki




Mirza Ghalib Shayari In Hindi | मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी

Hazaron Khwahishe Aisi



“हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पर दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमां लेकिन फिर भी कम निकले”

 

Hazaron Khwahishe Aisi Ki Har Khwahish Par Dum Nikle
Bahut Nikle Mere Armaan Lekin Phir Bhi Kam Nikle - Mirza Ghalib 


Urdu and hindi shayari – Galib – Mirza Galib ki shayari - N Tha Kuch Toh Khuda Tha



 

N Tha Kuch Toh Khuda



“न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता,
डुबोया मुझको होनी ने, न होता मैं तो क्या होता?”


N Tha Kuch Toh Khuda Tha, Kuch N Hota To Khuda Hota
Duboya Mujhko Honi Ne, N Hota Mai Toh Kya Hota - Mirza Ghalib 


Urdu and hindi shayari – Galib – Mirza Galib ki shayari - Aah Ko Chahiye

Mirza Ghalib Shayari Collection In Hindi




Mirza Ghalib Shayari In Hindi | मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी

आह को चाहिए

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

 

दाम-ए-हर-मौज में है हल्क़ा-ए-सद-काम-ए-नहंग
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होते तक

 

आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होते तक

 

ता-क़यामत शब-ए-फ़ुर्क़त में गुज़र जाएगी उम्र
सात दिन हम पे भी भारी हैं सहर होते तक

 

हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होते तक

 

परतव-ए-ख़ुर से है शबनम को फ़ना की तालीम
मैं भी हूँ एक इनायत की नज़र होते तक

 

यक नज़र बेश नहीं फ़ुर्सत-ए-हस्ती ग़ाफ़िल
गर्मी-ए-बज़्म है इक रक़्स-ए-शरर होते तक

 

ग़म-ए-हस्ती का 'असद' किस से हो जुज़ मर्ग इलाज
शम्अ हर रंग में जलती है सहर होते तक

 

Mirza Ghalib Shayari In Hindi 2 Lines




Waada-e-Wafa Karo



“वादा-ए-वफ़ा करो तो फिर खुद को फ़ना करो,
वरना खुदा के लिए किसी की ज़िंदगी ना तबाह करो”


Waada-e-Wafa Karo Toh Phir Ko Fana Karo
Warna Khuda Ke Liye Kisi Ki Zindagi Na Tabaah Karo - Mirza Ghalib 

Urdu and hindi shayari – Galib – Mirza Galib ki shayari - Aa Hi Jaata Wo Raah



 

Aa Hi Jaata Wo Raah Pe



आ ही जाता वो राह पर 'ग़ालिब'
कोई दिन और भी जिए होते

 

Aa Hi Jaata Wo Raah Pe Ghalib
Koi Din Aur Bhi Jiye Hote - - Mirza Ghalib 




Aaya Hai Bekasi-e-Ishq



आए है बेकसी-ए-इश्क़ पे रोना 'ग़ालिब'
किस के घर जाएगा सैलाब-ए-बला मेरे बाद


Aaya Hai Bekasi-e-Ishq Pe Rona Ghalib
Kisi Ke Ghar Jayega Sailaab-e-Bala Mere Baad - Mirza Ghalib 




Aaina Dekh Apna Sa



आईना देख अपना सा मुँह ले के रह गए
साहब को दिल न देने पे कितना ग़ुरूर था


Aaina Dekh Apna Sa Muh Le Ke Reh Gaye
Sahab Ko Dil N Dene Pe Kitna Guroor Tha - Mirza Ghalib 


Mirza Ghalib Shayari In Hindi 2 Lines




Mirza Ghalib Love Shayari

 आईना क्यूँ न दूँ

आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे
ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे

 

हसरत ने ला रखा तिरी बज़्म-ए-ख़याल में
गुल-दस्ता-ए-निगाह सुवैदा कहें जिसे


फूँका है किस ने गोश-ए-मोहब्बत में ऐ ख़ुदा
अफ़्सून-ए-इंतिज़ार तमन्ना कहें जिसे

 

सर पर हुजूम-ए-दर्द-ए-ग़रीबी से डालिए
वो एक मुश्त-ए-ख़ाक कि सहरा कहें जिसे

 

है चश्म-ए-तर में हसरत-ए-दीदार से निहाँ
शौक़-ए-इनाँ गुसेख़्ता दरिया कहें जिसे

 

दरकार है शगुफ़्तन-ए-गुल-हा-ए-ऐश को
सुब्ह-ए-बहार पुम्बा-ए-मीना कहें जिसे

 

'ग़ालिब' बुरा न मान जो वाइ'ज़ बुरा कहे
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे

 

या रब हमें तो ख़्वाब में भी मत दिखाइयो
ये महशर-ए-ख़याल कि दुनिया कहें जिसे


है इंतिज़ार से शरर आबाद रुस्तख़ेज़
मिज़्गान-ए-कोह-कन रग-ए-ख़ारा कहें जिसे

 

किस फ़ुर्सत-ए-विसाल पे है गुल को अंदलीब
ज़ख़्म-ए-फ़िराक़ ख़ंदा-ए-बे-जा कहें जिसे

Mirza Ghalib Shayari In Hindi | मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी




Aaina Kyu N Du Ki



आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे
ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे

 

Aaina Kyu N Du Ki Tamasha Kahe Jise
Aisa Kahan Se Laaun Ki Tujh Sa Kahe Jise - Mirza Ghalib 




Aankh Ki Tasveer



आँख की तस्वीर सर-नामे पे खींची है कि
तुझ पे खुल जावे कि इस को हसरत-ए-दीदार है


Aankh Ki Tasveer Sar-Name Pe Kheechi Hai Ki
Tujh Pe Khul Jaawe Ki Is Ko Hasrat-e-Didaar Hai - Mirza Ghalib 




Aagahi Daam-e-Shunidan



आगही दाम-ए-शुनीदन जिस क़दर चाहे बिछाए
मुद्दआ अन्क़ा है अपने आलम-ए-तक़रीर का

 

Aagahi Daam-e-Shunidan Jis Kadar Chahe Bichaye
Mudda Anka Hai Apne Alam-e-Takreer Ka - Mirza Ghalib 




Aah Ko Chahiye Ik Umr

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक


Aah Ko Chahiye Ik Umr Asar Hone Tak
Kaun Jeeta Hai Teri Zulfon Ke Sar Hone Tak - Mirza Ghalib 


Best Shayari Of Mirza Ghalib In Hindi



आशिक़ हूँ प माशूक़-फ़रेबी है मिरा काम
मजनूँ को बुरा कहती है लैला मिरे आगे

 

Aashiq Hu Par Mashuk-Farebi Mera Kaam
Majnu Ko Bura Kehti Hai Laila Mere Aage - Mirza Ghalib 


Mirza Ghalib Romantic Shayari In Hindi




Best Shayari of Mirza Ghalib

दिया है दिल अगर उस को


दिया है दिल अगर उस को , बशर है क्या कहिये
हुआ रक़ीब तो वो , नामाबर है , क्या कहिये

 

यह ज़िद की आज न आये और आये बिन न रहे
काजा से शिकवा हमें किस क़दर है , क्या कहिये

 

ज़ाहे -करिश्मा के यूँ दे रखा है हमको फरेब
की बिन कहे ही उन्हें सब खबर है , क्या कहिये

 

समझ के करते हैं बाजार में वो पुर्सिश -ऐ -हाल
की यह कहे की सर -ऐ -रहगुज़र है , क्या कहिये

 

तुम्हें नहीं है सर-ऐ-रिश्ता-ऐ-वफ़ा का ख्याल
हमारे हाथ में कुछ है , मगर है क्या कहिये

 

कहा है किस ने की “ग़ालिब ” बुरा नहीं लेकिन
सिवाय इसके की आशुफ़्तासार है क्या कहिये




 

आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होते तक


Aashiqui Sabr-Talab Aur Tamanna Betaab
Dil Ka Kya Rang Karun Khoon-e-Jigar Hone Tak - Mirza Ghalib 




 

आता है दाग़-ए-हसरत-ए-दिल का शुमार याद
मुझसे मिरे गुनह का हिसाब ऐ ख़ुदा न माँग

 

Aata Hai Daag-e-Hasrat-e-Dil Ka Shumaar Yaad
Mujhse Mere Gunaah Ka Hisaab Ae Khuda N Maang - Mirza Ghalib 




 

अदा-ए-ख़ास से 'ग़ालिब' हुआ है नुक्ता-सरा 
सला-ए-आम है यारान-ए-नुक्ता-दाँ के लिए


Ada-e-Khaas Se "Ghalib" Hua Hai Nukta-Sara
Sala-e-Aam Hai Yaraan-e-Nukta-Daa Ke Liye - Mirza Ghalib 




 

अगर ग़फ़लत से बाज़ आया जफ़ा की
तलाफ़ी की भी ज़ालिम ने तो क्या की


Agar Gaflat Se Baaj Aaya Zafa Ki
Talaafi Ki Bhi Zaalim Ne Toh Kya Ki - Mirza Ghalib 




 

अपनी गली में मुझ को न कर दफ़्न बाद-ए-क़त्ल
मेरे पते से ख़ल्क़ को क्यूँ तेरा घर मिले


Apni Gali Me Mujhko N Kar Dafn Baad-e-Katl
Mere Pate Se Khalk Ko Kyu Tera Ghar Mile - Mirza Ghalib 

 

Mirza Ghalib Sad Shayari In Hindi




Mirza Ghalib Shayari Collection In Hindi

दिल-ए-नादान

 

दिल-ए-नादान तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द कि दवा क्या है।

 

हम हैं मुश्ताक और वो बेज़ार
या इलाही ये माजरा क्या है।

 

मैं भी मुँह मे ज़बान रखता हूँ
काश पूछो कि मुद्दा क्या है।

 

जब कि तुझ बिन नही कोई मौजूद
फिर ये हंगामा ए खुदा क्या है।

 

हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है।

 

जान तुम पर निसार करता हूँ
मैं नहीं जानता दुआ क्या है।

 

मैंने माना कि कुछ नहीं ग़ालिब
मुफ़्त हाथ आये तो बुरा क्या है 




 

बक रहा हूँ जुनूँ में क्या क्या कुछ
कुछ न समझे ख़ुदा करे कोई


Bak Raha Hi Junun Me Kya-Kya Kuch
Kuch N Samjhe Khuda Kare Koi - Mirza Ghalib 





 

रोने से और इश्क़ में बे-बाक हो गए
धोए गए हम ऐसे कि बस पाक हो गए

 

Rone Se Aur Ishq Me Be-Baak Ho Gaye
Dhoye Gaye Hum Aise Ki Bas Paak Ho Gaye - Mirza Ghalib 




 

बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना


Bas Ki Dushwaar Hai Har Kaam Ka Aassan Hona
Aadmi Ko Bhi Mayassar Nahin Insaan Hona - Mirza Ghalib 




 

हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन,
दिल के खुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है।

 

Humko Maloom Hai Jannat Ki Haqiqat Lekin
Dil Ko Khush Rakhne Ke Liye "Ghalib" Ye Khayal Achcha Hai - Mirza Ghalib 




Mirza Ghalib Shayari In Hindi 2 Lines

ये न थी हमारी क़िस्मत

 

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।

 

तेरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूठ जाना
कि खुशी से मर न जाते ग़र ऐतबार होता।

 

ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह
कोई चारासाज होता कोई ग़म-गुसार होता

 

कहूँ किससे मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता।

 

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता।


Mirza Ghalib Shayari In Hindi | मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी




 

उनको देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक,
वो समझते हैं के बीमार का हाल अच्छा है।


Unko Dekhe De Jo Aa Jaati Hai Muh Par Raunak
Wo Samjhte hai Ke Bimaar Ka Haal Achcha Hai - Mirza Ghalib 





इश्क़ पर जोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब',

कि लगाये न लगे और बुझाये न बुझे


Ishq Par Zor Nahin Hai Ye Wo Aatish Hai "Ghalib"
Ki Lagaye N Lage Bujhaye N Bujhe - Mirza Ghalib 




Shayari Of Mirza Ghalib

कहते हो, न देंगे हम

 

कहते हो, न देंगे हम, दिल अगर पड़ा पाया
दिल कहाँ कि गुम कीजे? हमने मुद्दआ़ पाया

 

इश्क़ से तबीअ़त ने ज़ीस्त का मज़ा पाया
दर्द की दवा पाई, दर्द बे-दवा पाया

 

दोस्त दारे-दुश्मन है, एतमादे-दिल मालूम
आह बेअसर देखी, नाला नारसा पाया

 

सादगी व पुरकारी बेख़ुदी व हुशियारी
हुस्न को तग़ाफ़ुल में जुर्रत-आज़मा पाया

 

ग़ुञ्चा फिर लगा खिलने, आज हम ने अपना दिल
खूं किया हुआ देखा, गुम किया हुआ पाया

 

हाल-ए-दिल नहीं मालूम, लेकिन इस क़दर यानी
हम ने बारहा ढूंढा, तुम ने बारहा पाया

 

शोर-ए-पन्दे-नासेह ने ज़ख़्म पर नमक छिड़का
आप से कोई पूछे, तुम ने क्या मज़ा पाया

 

ना असद जफ़ा-साइल ना सितम जुनूं-माइल
तुझ को जिस क़दर ढूंढा उल्फ़त-आज़मा पाया


Mirza Ghalib Shayari In Hindi | मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी



लो हम मरीज़-ए-इश्क़ के बीमार-दार हैं
अच्छा अगर न हो तो मसीहा का क्या इलाज

 

Lo Hum Mareez-e-Ishq Ke Bimaar-Daar Hai
Achcha Agar N Ho Toh Maseeha Ka Kya Ilaaz - Mirza Ghalib 




Mirza Ghalib Shayari In Hindi | मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी



बे-ख़ुदी बे-सबब नहीं 'ग़ालिब'
कुछ तो है जिस की पर्दा-दारी है


Bekhudi Be-Sabab Nahi "Ghalib"
Kuch Toh Hai Jiski Pardaadaari Hai - Mirza Ghalib 




Best Shayari Of Mirza Ghalib In Hindi



बोसा देते नहीं और दिल पे है हर लहज़ा निगाह
जी में कहते हैं कि मुफ़्त आए तो माल अच्छा है


Bosa Dete Nahi Aur Dil Pe Hai Har Lehjaa Nigaah
Ji Me Kehte Hai Ki Muft Aaye Toh Maal Achcha Hai



 

Mirza Ghalib Romantic Shayari In Hindi



चाहिए अच्छों को जितना चाहिए
ये अगर चाहें तो फिर क्या चाहिए

 

Chahiye Achcho Ko Jitna Chahiye
Ye Agar Chahe Toh Phir Kya Chahiye




मेहरबां हो के बुला लो मुझे

 

मेहरबां हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वकत
मैं गया वकत नहीं हूं कि फिर आ भी न सकूं

 

जोफ़ में ताना-ए-अग़यार का शिकवा क्या है
बात कुछ सर तो नहीं है कि उठा भी न सकूं

 

ज़हर मिलता ही नहीं मुझको सितमगर वरना
क्या कसम है तिरे मिलने की कि खा भी न सकूं




Mirza Ghalib Best Shayari



चंद तस्वीर-ऐ-बुताँ , चंद हसीनों के खतूत 
बाद मरने के मेरे घर से यह सामान निकला


Chand Tasveer-E-Butaan, Chand Hasino Ke Khatoot
Baad Marne Ke Mere Ghar Se Yeh Samaan Nikla




Mirza Ghalib Shayari In English



मैं नादान था जो वफ़ा को तलाश करता रहा ग़ालिब
यह न सोचा के एक दिन अपनी साँस भी बेवफा हो जाएगी


Mai Nadaan Tha Jo Wafa Ko Talash Karta Raha "Ghalib"
Yeh N Socha Ki Ek Din Apni Sans Bhi Bewafa Ho Jayegi




Shayari By Mirza Ghalib



तोड़ा कुछ इस अदा से तालुक़ उस ने ग़ालिब
के सारी उम्र अपना क़सूर ढूँढ़ते रहे


Toda Kuch Is Ada Se Talluk Us Ne "Ghalib"
Ke Saari Umr Apna Kasoor Dhoondhte Rahe




 

बे-वजह नहीं रोता इश्क़ में कोई ग़ालिब
जिसे खुद से बढ़ कर चाहो वो रूलाता ज़रूर है


Be-Wajah Nahi Rota Ishq Me Koi "Ghalib"
Jise Khud Se Badhkar Chaho Wo Rulaata Zaroor Hai




घर जब बना लिया तेरे दर पर

 

घर जब बना लिया तेरे दर पर कहे बग़ैर
जानेगा अब भी तू न मेरा घर कहे बग़ैर

 

कहते हैं, जब रही न मुझे ताक़त-ए-सुख़न
जानूं किसी के दिल की मैं क्योंकर कहे बग़ैर

 

काम उससे आ पड़ा है कि जिसका जहान में
लेवे ना कोई नाम सितमगर कहे बग़ैर

 

जी में ही कुछ नहीं है हमारे, वगरना हम
सर जाये या रहे, न रहें पर कहे बग़ैर

 

छोड़ूँगा मैं न उस बुत-ए-काफ़िर का पूजना
छोड़े न ख़ल्क़ गो मुझे काफ़िर कहे बग़ैर

 

मक़सद है नाज़-ओ-ग़म्ज़ा वले गुफ़्तगू में काम
चलता नहीं है, दश्ना-ओ-ख़ंजर कहे बग़ैर

 

हरचन्द हो मुशाहित-ए-हक़ की गुफ़्तगू
बनती नहीं है बादा-ओ-साग़र कहे बग़ैर

 

बहरा हूँ मैं तो चाहिये दूना हो इल्तफ़ात
सुनता नहीं हूँ बात मुक़र्रर कहे बग़ैर

 

"ग़ालिब" न कर हुज़ूर में तू बार-बार अर्ज़
ज़ाहिर है तेरा हाल सब उन पर कहे बग़ैर




 

खुदा के वास्ते पर्दा न रुख्सार से उठा ज़ालिम
कहीं ऐसा न हो जहाँ भी वही काफिर सनम निकले


Khuda Ke Vaaste N Rukhsaar Se Utha Zaalim
Kahi Aisa N Ho Jahan Bhi Wahi Kaafir Nikle




 

तेरी दुआओं में असर हो तो मस्जिद को हिला के दिखा
नहीं तो दो घूँट पी और मस्जिद को हिलता देख


Teri Duaaon Me Asar Ho To Majid Ko Hilta Dikha
Nahin Toh Do Ghoont Pi Aur Masjid Ko Hilta Dekh




 

मोहब्बत मैं नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते है जिस काफिर पे दम निकले


Mohabbat Me Nahin Hai Fark Jine Marne Ka
Usi Ko Dekh Kar Jite Hai Jis Kaafir Pe Dum Nikle




ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर

 

ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं
कभी सबा तो कभी नामाबर को देखते हैं

 

वो आये घर में हमारे ख़ुदा की कुदरत है
कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं

 

नज़र लगे न कहीं उसके दस्त-ओ-बाज़ू को
ये लोग क्यों मेरे ज़ख़्म-ए-जिगर को देखते हैं

 

तेरे जवाहीर-ए-तर्फ़-ए-कुलह को क्या देखें
हम औज-ए-ताला-ए-लाल-ओ-गुहर को देखते हैं




Mirza Ghalib Shayari In Hindi | मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी



लफ़्ज़ों की तरतीब मुझे बांधनी नहीं आती “ग़ालिब”
हम तुम को याद करते हैं सीधी सी बात है


Lafzon Ki Tarteeb Mujhe Bandhni Nahi Aati "Ghalib"
Hum Tumko Yaad Karte Hai Seedhi Baat Hai




 

Mirza Ghalib Shayari In English



थी खबर गर्म के ग़ालिब के उड़ेंगे पुर्ज़े ,
देखने हम भी गए थे पर तमाशा न हुआ


Thi Khabar Garm Ke Ghalib Ke Udenge Purje
Dekhne Hum Bhi Gaye The Par Tamasha N Hua




 

“ग़ालिब ” बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे
ऐसा भी कोई है के सब अच्छा कहे जिसे


Ghalib Bura N Maan Ji Vaaiz Bura Kahe
Aisa Bhi Koi Hai Ke Sab Achcha Kahe Jise




रहिये अब ऐसी जगह

रहिये अब ऐसी जगह चलकर जहाँ कोई न हो
हमसुख़न कोई न हो और हमज़बाँ कोई न हो

 

बेदर-ओ-दीवार सा इक घर बनाया चाहिये
कोई हमसाया न हो और पासबाँ कोई न हो

 

पड़िये गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार
और अगर मर जाईये तो नौहाख़्वाँ कोई न हो




 

आया है मुझे बेकशी इश्क़ पे रोना ग़ालिब
किस का घर जलाएगा सैलाब भला मेरे बाद


Aaya Hai Mujhe Bekashi Ishq Pe Rona Ghalib
Kis Ka Ghar Jalayega Sailaab Bhala Mere Baad




 

गम -ऐ -हस्ती का असद किस से हो जूझ मर्ज इलाज
शमा हर रंग मैं जलती है सहर होने तक


Gum-e-Hasti Ka Asad Kis Se Ho Joojh Marz Ilaaz
Shama Har Rang Me Jalti Hai Shehar Hone Tak


 

Mirza Ghalib Romantic Shayari In Hindi



ग़ालिब ‘ हमें न छेड़ की फिर जोश -ऐ -अश्क से
बैठे हैं हम तहय्या -ऐ -तूफ़ान किये हुए


"Ghalib" Hamein N Ched Ki Phir Josh-e-Ashq Se
Baithe Hai Hum Tahayya-e-Tufaan Kiye Hue 




इश्क़ मुझको नहीं

 

इश्क़ मुझको नहीं, वहशत ही सही
मेरी वहशत, तेरी शोहरत ही सही

 

क़तइ कीजे न तअ़ल्लुक़ हम से
कुछ नहीं है, तो अ़दावत ही सही

 

मेरे होने में है क्या रुस्वाई?
ऐ वो मजलिस नहीं ख़िल्वत ही सही

 

हम भी दुश्मन तो नहीं हैं अपने
ग़ैर को तुझ से मुहब्बत ही सही

 

अपनी हस्ती ही से हो, जो कुछ हो
आगही गर नहीं ग़फ़लत ही सही

 

उम्र हरचंद कि है बर्क़-ख़िराम
दिल के ख़ूँ करने की फ़ुर्सत ही सही

 

हम कोई तर्क़-ए-वफ़ा करते हैं
न सही इश्क़ मुसीबत ही सही

 

कुछ तो दे, ऐ फ़ल-ए-नाइन्साफ़
आह-ओ-फ़रिय़ाद की रुख़सत ही सही

 

हम भी तस्लीम की ख़ू डालेंगे
बेनियाज़ी तेरी आदत ही सही

 

यार से छेड़ चली जाये, "असद"
गर नहीं वस्ल तो हसरत ही सही




 

करने गए थे उस से तग़ाफ़ुल का हम गिला
बस एक ही निगाह की बस ख़ाक हो गए


Karne Gaye The Us Se Tagaluf Ka Hu Gila
Bas Ek Hi Nigaah Ki bas Khaak Ho Gaye




 

रात है ,सन्नाटा है , वहां कोई न होगा, ग़ालिब
चलो उन के दरो -ओ -दीवार चूम के आते हैं


Raat Hai, Sannata Hai, Wahan Koi N Hoga "Ghalib"
Chalo Unke Da-o-Dewaar Choom Aate Hai

 


 

तेरे हुस्न को परदे की ज़रुरत नहीं है "ग़ालिब"
कौन होश में रहता है तुझे देखने के बाद


Tere Husn Ko Parde Ki Jarurat Nahi Ghalib
Kaun Hosh Me Rehta Hai Tujhe Dekhne Ke Baad




 

तू तो वो जालिम है जो दिल में रह कर भी मेरा न बन सका , ग़ालिब
और दिल वो काफिर, जो मुझ में रह कर भी तेरा हो गया


Tu Toh Wo Zaalim Hai jO Dil Me Rehkar Bhi Mera N Ban Saka, Ghalib
Aur Dil Wo Kaafir, Jo Mujh Me Rehkar Bhi Tera Ho Gaya




वफ़ा के ज़िक्र में ग़ालिब

 

वफ़ा के ज़िक्र में ग़ालिब मुझे गुमाँ हुआ
वो दर्द इश्क़ वफाओं को खो चुका होगा

 

जो मेरे साथ मोहब्बत में हद -ऐ -जूनून तक था
वो खुद को वक़्त के पानी से धो चुका होगा

 

मेरी आवाज़ को जो साज़ कहा करता था
मेरी आहोँ को याद कर के सो चुका होगा

 

वो मेरा प्यार , तलब और मेरा चैन -ओ -क़रार
जफ़ा की हद में ज़माने का हो चुका होगा

 

तुम उसकी राह न देखो वो ग़ैर था साक़ी
भुला दो उसको वो ग़ैरों का हो चुका होगा




Mirza Ghalib Shayari Collection In Hindi



वो आये घर में हमारे , खुदा की कुदरत है
कभी हम उन्हें कभी अपने घर को देखते है


Wo Aaye Ghar Me Hamare, Khuda Ki Kudrat Hai
Kabhi Hum Unhe Kabhi Unke Ghar Ko Dekhte Hai




 

न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता,
डुबोया मुझको होनी ने, न होता मैं तो क्या होता


N Tha kuch Toh Khuda Tha, Kuch N Hota Toh Khuda Hota
Dooboya Mujhko Honi Ne, N Hota Toh Mai Kya Hota

 


 

कितना खौफ होता है शाम के अंधेरों में,
पूछ उन परिंदों से जिनके घर नहीं होते

 

Kitna Khauf Hota Hai Shaam Ke Andheron Me
Pooch Un Parindo Se Jinke Ghar Nahi Hote


 

हर एक बात पर कहते हो

 

हर एक बात पर कहते हो तुम कि तो क्या है?
तुम्ही कहो कि ये अंदाज-ए-गुफ्तगु क्या

 

रगों में दौड़ते-फिरने के हम नहीं कायल,
जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है?

 

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारी जेब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है?

 

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है?

 

रही ना ताक़त-ए-गुफ़्तार और हो भी
तो किस उम्मीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है?




 

दिल-ए-नादान तुझे हुआ क्या है,
आखिर इस दर्द की दवा क्या है


Dil-e-Nadaan Tujhe Hua Kya Hai
Aakhir Is Dard Ki Dawa Kya Hai




 

इस कदर तोड़ा है मुझे उसकी बेवफाई ने गालिब,
अब कोई प्यार से भी देखे तो बिखर जाता हूं मैं


Is Qadar Toda Hai Mujhe Uski Bewafai Ne "Ghalib"
Ab Koi Pyaar Bhi Dekhe Toh Bikhar Jaata Hu Mai




Best Shayari Of Mirza Ghalib



हम तो फना हो गए उसकी आंखे देखकर गालिब,
न जाने वो आइना कैसे देखते होंगे


Hum Toh Fana Ho Gyae Uski Aankhe Dekhkar Ghalib
N Jaane Wo Aaina Kaise Dekhte Honge




 

खत लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के
इश्क़ ने “ग़ालिब” निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी थे काम के


Khat Likhenge Garche Matlab Kuch N Ho
Hum Toh Aashiq Hai Tumhare Naam Ke
Ishq Ne Ghalib Nikamma Kar Diya
Warna Hum Bhi Aadmi The Kaam Ke

 


 

तुम न आए तो क्या सहर न हुई
हाँ मगर चैन से बसर न हुई
मेरा नाला सुना ज़माने ने
एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई


Tum N Aaye Toh Kya Sehar Nahi Hui
Ha Magar Chain Se Basar Nahi Hui
Mera Naala Suna Zamane Ne
Ek Tum Ho Jise Khabar N Hui




 

दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई
दोनों को एक अदा में रजामंद कर गई
मारा ज़माने ने ‘ग़ालिब’ तुम को
वो वलवले कहाँ , वो जवानी किधर गई


Dil Se Teri Nigaah Jigar Tak Utar Gayi
Dono Ko Ek Ada Me Rajamand Kar Gayi
Maara Zamane Ne Ghalib Tumko
Wo Valvale Kahan Wo Jawani Kidhar Gayi




 

इश्क़ मुझको नहीं वेहशत ही सही
मेरी वेहशत तेरी शोहरत ही सही
कटा कीजिए न तालुक हम से
कुछ नहीं है तो अदावत ही सही


Ishq Mujhko Nahi Wahsat Hi Sahi
Meri Wahsat Teri Soharat Hi Sahi
Kata Kijiye N Talluk Hamse
Kuch Nahi Adawat Hi Sahi




 

सादगी पर उस के मर जाने की हसरत दिल में 
बस नहीं चलता की फिर खंजर काफ-ऐ-क़ातिल में है
देखना तक़रीर के लज़्ज़त की जो उसने कहा
मैंने यह जाना की गोया यह भी मेरे दिल में है

 

Saadgi Par Uske Mar Jaane Ki Hasrat Dil Me
Bas Nahi Chalta Ki Phir Khanjar Kaaf-e-Qaatil Me Hai
Dekhna Takreer Ke Lajjat Ki Jo Usne Kaha
Maine Yeh Jaana Ki Goya Yeh Bhi Mere Dil Me Hai




Brief Intro About Mirza Ghalib


पूरा नाम-मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां
उपनाम-
असद,ग़ालिब
जन्म-
27 दिसम्बर सन् 1797
जन्म-स्थान-
आगरा
मृत्यु-
15 फरवरी सन् 1869
मृत्यु-स्थान-
दिल्ली
माता का नाम –
इज्ज़त निसा बेगम
पिता का नाम –
मिर्ज़ा अबदुल्लाह बेग खान
पत्नी का नाम –
उमराव बेगम
पुत्र का नाम-
अब्दुल्ला बेग खान व मिर्ज़ा नसरुल्ला बेग
पुत्री का नाम- 
UNKNOWN
खिताब-
दबीर-उल-मुल्क, नज़्म-उद-दौला और मिर्ज़ा नोशा


“इश्क़ की इबादत हो या खुदा से शिकायत, अपनों से नफरत हो या दुश्मनो से मोहब्बत, हर शेर और शायरी में कुछ अपना सा दर्द छलक जाता है।”  इनका लिखा हर लफ्ज़ खुद में हर दर्द का दरिया है। जी हाँ हम बात कर रहे है इश्क़ के बादशाह, शेर-ओ-शायरी के सरताज और आला दर्जे के फनकार मिर्ज़ा ग़ालिब की।

जहाँ शायरी की बात आती है वहाँ ग़ालिब का जिक्र ज़रूर हो उठता है। ये उर्दू साहित्य में अव्वल किस्म के शायरो में गिने जाते है। इनका पूरा जीवन विचारो से संघर्ष करता रहा और वही से इन्होंने ज़िन्दगी के हर लम्हे को रेशे की तरह निकाल कर अपनी शायरी में पेश किया उनकी लिखी हर एक शायरी सीधे दिल को छू जाती है। इश्क़, मोहब्बत और उसमें छुपी दर्द भरी ज़िन्दगी की कहानी बहुत ही शानदार खयालो से इन्होंने उर्दू को सजाया है।”

                                                                  ” हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
                                                                     कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और ”

उर्दू और फारसी के महान शायर “मिर्ज़ा ग़ालिब” का जन्म 27 दिसम्बर सन् 1997 को उत्तर-प्रदेश के आगरा जिले के काला महल में हुआ था इनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि एक तुर्क और सैन्य परिवार से थी इनके दादा “मिर्ज़ा क़ोबान बेग खान” “अहमद शाह” के शासन काल में मध्य एशिया के समरकंद से सन् 1750 के आसपास भारत आये और दिल्ली,लौहार और जयपुर में काम करने के पश्चात आगरा में आकर बस गए

इनके पिता का नाम “मिर्ज़ा अबदुल्लाह बेग खान” था जिन्होंने एक कश्मीरी लड़की “इज्ज़त निसा बेगम” से निकाह किया और वे ससुराल में ही रहने लगे। उन्होंने लखनऊ के नवाब और बाद में हैदराबाद के निजाम के यहाँ भी काम किया। सन् 1803 में अलवर (राजस्थान) में युद्ध के दौरान उनकी मृत्यु हो गयी और उस वक्त मिर्जा ग़ालिब केवल पांच वर्ष के थे। चाचा “मिर्जा नसरुल्ला बैग खान” ने उनका पालन-पोषण किया। जो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी में सैन्य अधिकारी थे।  मिर्ज़ा ग़ालिब का जीवन-यापन इनके चाचा के मरणोपरांत मिलने वाले पेंशन से हुआ

शिक्षण-


गालिब को बचपन में ही पतंग, शतरंज और जुए की आदत लगी किन्तु जिस मुहल्ले में गालिब रहते थे। वहाँ उस उस जमाने में फारसी भाषा के शिक्षण का उच्च केन्द्र (गुलाबखाना) था. वहां मुल्ला वली मुहम्मद, उनके बेटे शम्सुल जुहा, मोहम्मद बदरुद्दिजा, आज़म अली तथा मौहम्मद कामिल वगैरा फारसी के एक-से-एक विद्वान वहां रहते थे। इनके ही प्रभाव में इन्होंने शायरी शुरू की ग़ालिब की प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण रूप से स्पष्ट नही है किंतु कहा जाता है कि- इनकी शिक्षित मां ने इनको को घर पर ही शिक्षा दी और लगभग 11 वर्ष के आयु से ही उर्दू और फ़ारसी में कविताएं लिखना आरम्भ कर दिए।

इनके गीत काव्य में रहस्य,रोमानी और प्यार का दर्द स्पष्ट रूप से झलकता है। जिन्हें आज लोग ग़ज़ल के रूप में पढ़ा करते है। फारसी की प्रारम्भिक शिक्षा इन्होंने आगरा के प्रतिष्ठित विद्वान ‘मौलवी मोहम्मद मोवज्जम’ से प्राप्त की। मात्र 13 वर्ष की आयु में उनका विवाह “नवाब ईलाही बख्श” की बेटी “उमराव बेगम” से हो गया।इसके बाद वो अपने छोटे भाई “मिर्जा युसूफ खान” के साथ दिल्ली में बस गये एक नव-मुस्लिम-वर्तित ईरान से दिल्ली आए थे उनके ही सान्निध्य में रहकर ग़ालिब ने फ़ारसी सीखी। लेकिन उनके छोटे भाई की एक दिमागी बीमारी की वजह से छोटी उम्र में ही मौत हो गयी। ग़ालिब के सात बच्चे पैदा होने से पहले ही मर गये थे। इसलिए वे काफी दुखी हुए। उन्होंने एक कविता में भी इसका जिक्र भी किया है कि-

“क़ैद-ए-हयात-ओ-बंद-ए-ग़म, अस्ल में दोनों एक हैं,मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाए क्यूँ”? 


यहाँ पर इन्होंने अपना तमाम वक्त बिताया। बाद में मिर्ज़ा ग़ालिब की तीन पुत्रियाँ और दो बेटे पैदा हुए। अपने पेंशन के सिलसिले में उन्होंने कोलकाता की लम्बी यात्राये भी की जिनका ज़िक्र उनकी ग़ज़लों मे कही-कही स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब अपनी हर रचना में “असद” या “ग़ालिब” नाम का प्रयोग करते थे इसलिये इनका ये नाम काफी प्रसिद्ध हुआ। ग़ालिब 19वीं और 20वीं शताब्दी में उर्दू और फारसी के बेहतरीन शायर के रूप में लोकप्रिय होने लगे।अन्य राष्ट्रों में भी उनकी ख्यातियां धीरे-धीरे फैलनी लगी थी। सन् 1850 में बहादुर शाह ज़फर के सत्ता में आने के बाद मिर्ज़ा ग़ालिब को मुख्य दरबारी बनाया गया और उन्हें “बीर-उल-मुल्क” और “नज़्म-उद-दौला” के खिताब से नवाज़ा गया। बाद में उन्हें “मिर्ज़ा नोशा” का भी खिताब मिला।

बहादुर शाह ज़फर को भी कविता में काफी रूचि थी इसलिए सन् 1854 में मिर्ज़ा इन्हें कविता सिखाने लगे और बहादुर शाह ज़फर द्वितीय के ज्येष्ठ पुत्र “राजकुमार फ़क्र-उद-दिन मिर्ज़ा” के शिक्षक भी नियुक्त किये गये जो एक समय में मुगल दरबार के शाही इतिहासविद थे। सन् 1857 में युद्ध के दौरान ब्रिटिश राज से मुग़ल सेना की हार हुई और बहादुर शाह जफर को म्यामार की रंगून जेल में कैद कर लिया गया। इस तरह पूरा साम्राज्य नष्ट हो गया और मिर्ज़ा की आय भी बंद हो गई। और वे आगरा से दिल्ली चले गए ग़ालिब जिस मकान में रहते थे उसे “ग़ालिब हवेली” कहा जाने लगा

निधन-

ग़ालिब इस दुनिया के फलसफे से खूब परिचय थे। जीवन के अंतिम क्षणों में ख़ुशी-ख़ुशी सदैव के लिए 15 फरवरी सन् 1869 को इस दुनिया से रुख्सत हो गए।
उनके निधन के पश्चात उनकी हवेली को एक स्मारक के रूप में तब्दील कर दिया गया और ग़ालिब की कब्र दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में निजामुद्दीन ओलिया के नजदीक बनवाई गयी ग़ालिब के मृत्यु के एक वर्ष पश्चात “उमराव बेगम” का भी निधन हो गया। इनके याद में सन् 1954 में “मिर्ज़ा ग़ालिब” नाम की एक फिल्म बनाई गई जिसका निर्देशन “सोहरब मोदी ‘ ने किया और 22 फरवरी ,सन् 1969 में दिल्ली में “गालिब संग्रहालय” स्थापित किया गया। जहाँ मिर्ज़ा के समस्त लेख और चित्र, सिक्के आदि सुरक्षित रखे गए है।


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    Mirza Ghalib Shayari In Hindi | मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी Mirza Ghalib Shayari In Hindi | मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी Reviewed by Feel neel on November 24, 2019 Rating: 5

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