Javed Akhtar Shayari In Hindi | जावेद अख्तर की शायरी

 

Javed Akhtar Shayari In Hindi | जावेद अख्तर की शायरी


बहाना ढूँढते रहते हैं

बहाना ढूँढते रहते हैं कोई रोने का
हमें ये शौक़ है क्या आस्तीं भिगोने का



अगर पलक पे है मोती तो ये नहीं काफ़ी
हुनर भी चाहिए अल्फ़ाज़ में पिरोने का

 

जो फ़स्ल ख़्वाब की तैयार है तो ये जानो
कि वक़्त आ गया फिर दर्द कोई बोने का

 

ये ज़िन्दगी भी अजब कारोबार है कि मुझे
ख़ुशी है पाने की कोई न रंज खोने का

 

है पाश-पाश मगर फिर भी मुस्कुराता है
वो चेहरा जैसे हो टूटे हुए खिलौने का


वो ढल रहा है

 
वो ढल रहा है तो ये भी रंगत बदल रही है
ज़मीन सूरज की उँगलियों से फिसल रही है

 

जो मुझको ज़िंदा जला रहे हैं वो बेख़बर हैं
कि मेरी ज़ंजीर धीरे-धीरे पिघल रही है

 

मैं क़त्ल तो हो गया तुम्हारी गली में लेकिन
मिरे लहू से तुम्हारी दीवार गल रही है

 

न जलने पाते थे जिसके चूल्हे भी हर सवेरे
सुना है कल रात से वो बस्ती भी जल रही है

 

मैं जानता हूँ की ख़ामशी में ही मस्लहत है
मगर यही मस्लहत मिरे दिल को खल रही है

 

कभी तो इंसान ज़िंदगी की करेगा इज़्ज़त
ये एक उम्मीद आज भी दिल में पल रही है

 

मैं भूल जाऊँ

 

मैं भूल जाऊँ तुम्हें अब यही मुनासिब है
मगर भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँ
कि तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो कोई ख़्वाब नहीं
यहाँ तो दिल का ये आलम है क्या कहूँ
कमबख़्त !
भुला न पाया ये वो सिलसिला जो था ही नहीं
वो इक ख़याल
जो आवाज़ तक गया ही नहीं
वो एक बात
जो मैं कह नहीं सका तुमसे
वो एक रब्त
जो हममें कभी रहा ही नहीं
मुझे है याद वो सब
जो कभी हुआ ही नहीं

 

मुझको यक़ीं है

 

मुझको यक़ीं है सच कहती थीं जो भी अम्मी कहती थीं
जब मेरे बचपन के दिन थे चाँद में परियाँ रहती थीं

 

एक ये दिन जब अपनों ने भी हमसे नाता तोड़ लिया
एक वो दिन जब पेड़ की शाख़ें बोझ हमारा सहती थीं

 

एक ये दिन जब सारी सड़कें रूठी-रूठी लगती हैं
एक वो दिन जब 'आओ खेलें' सारी गलियाँ कहती थीं

 

एक ये दिन जब जागी रातें दीवारों को तकती हैं
एक वो दिन जब शामों की भी पलकें बोझल रहती थीं

 

एक ये दिन जब ज़हन में सारी अय्यारी की बातें हैं
एक वो दिन जब दिल में भोली-भाली बातें रहती थीं

 

एक ये दिन जब लाखों ग़म और काल पड़ा है आँसू का
एक वो दिन जब एक ज़रा सी बात पे नदियाँ बहती थीं

 

एक ये घर जिस घर में मेरा साज़-ओ-सामाँ रहता है
एक वो घर जिस घर में मेरी बूढ़ी नानी रहती थीं

 

हम तो बचपन में भी


हम तो बचपन में भी अकेले थे
सिर्फ़ दिल की गली में खेले थे

 

इक तरफ़ मोर्चे थे पलकों के
इक तरफ़ आँसुओं के रेले थे

 

थीं सजी हसरतें दूकानों पर
ज़िन्दगी के अजीब मेले थे

 

ख़ुदकुशी क्या दुःखों का हल बनती
मौत के अपने सौ झमेले थे

 

ज़हनो-दिल आज भूखे मरते हैं
उन दिनों हमने फ़ाक़े झेले थे

 

सच ये है बेकार


सच ये है बेकार हमें ग़म होता है
जो चाहा था दुनिया में कम होता है

 

ढलता सूरज फैला जंगल रस्ता गुम
हमसे पूछो कैसा आलम होता है

 

ग़ैरों को कब फ़ुरसत है दुख देने की
जब होता है कोई हमदम होता है

 

ज़ख़्म तो हमने इन आँखों से देखे हैं
लोगों से सुनते हैं मरहम होता है

 

ज़हन की शाख़ों पर अशआर आ जाते हैं
जब तेरी यादों का मौसम होता है

ये तसल्ली है कि


ये तसल्ली है कि हैं नाशाद सब
मैं अकेला ही नहीं बरबाद सब

 

सब की ख़ातिर हैं यहाँ सब अजनबी
और कहने को हैं घर आबाद सब

 

भूलके सब रंजिशें सब एक हैं
मैं बताऊँ सबको होगा याद सब

 

सब को दावा-ए-वफ़ा सबको यक़ीं
इस अदकारी में हैं उस्ताद सब

 

शहर के हाकिम का ये फ़रमान है
क़ैद में कहलायेंगे आज़ाद सब

 

चार लफ़्ज़ों में कहो जो भी कहो
उसको कब फ़ुरसत सुने फ़रियाद सब

 

तल्ख़ियाँ कैसे न हों अशआर में
हम पे जो गुज़री हमें है याद सब

 

दर्द के फूल भी खिलते हैं


दर्द के फूल भी खिलते हैं बिखर जाते हैं
ज़ख़्म कैसे भी हों कुछ रोज़ में भर जाते हैं


 

रास्ता रोके खड़ी है यही उलझन कब से
कोई पूछे तो कहें क्या कि किधर जाते हैं


 

छत की कड़ियों से उतरते हैं मिरे ख़्वाब मगर
मेरी दीवारों से टकरा के बिखर जाते हैं


 

नर्म अल्फ़ाज़, भली बातें, मुहज़्ज़ब लहजे
पहली बारिश ही में ये रंग उतर जाते हैं


 

उस दरीचे में भी अब कोई नहीं और हम भी
सर झुकाए हुए चुपचाप गुज़र जाते हैं


 

दिल में महक रहे हैं


दिल में महक रहे हैं किसी आरज़ू के फूल
पलकों में खिलनेवाले हैं शायद लहू के फूल

 

अब तक है कोई बात मुझे याद हर्फ़-हर्फ़
अब तक मैं चुन रहा हूँ किसी गुफ़्तगू के फूल

 

कलियाँ चटक रही थी कि आवाज़ थी कोई
अब तक समाअतों में हैं इक ख़ुशगुलू के फूल

 

मेरे लहू का रंग है हर नोक-ए-ख़ार पर
सेहरा में हर तरफ़ है मिरी जुस्तजू के फूल

 

दीवाने कल जो लोग थे फूलों के इश्क़ में
अब उनके दामनों में भरे हैं रफ़ू के फूल

 

दुख के जंगल में

 

दुख के जंगल में फिरते हैं कब से मारे मारे लोग
जो होता है सह लेते हैं कैसे हैं बेचारे लोग

 

जीवन-जीवन हमने जग में खेल यही होते देखा
धीरे-धीरे जीती दुनिया धीरे-धीरे हारे लोग

 

वक़्त सिंहासन पर बैठा है अपने राग सुनाता है
संगत देने को पाते हैं साँसों के इकतारे लोग

 

नेकी इक दिन काम आती है हमको क्या समझाते हो
हमने बेबस मरते देखे कैसे प्यारे-प्यारे लोग

 

इस नगरी में क्यों मिलती है रोटी सपनों के बदले
जिनकी नगरी है वो जानें हम ठहरे बँजारे लोग

 

हमारे शौक़ की


हमारे शौक़ की ये इन्तहा थी
क़दम रक्खा कि मंज़िल रास्ता थी

 

बिछड़ के डार से बन-बन फिरा वो
हिरन को अपनी कस्तूरी सज़ा थी

 

कभी जो ख़्वाब था वो पा लिया है
मगर जो खो गई वो चीज़ क्या थी

 

मैं बचपन में खिलौने तोड़ता था
मिरे अंजाम की वो इब्तदा थी

 

मुहब्बत मर गई मुझको भी ग़म है
मिरे अच्छे दिनों की आशना थी


जिसे छू लूँ मैं वो हो जाये सोना
तुझे देखा तो जाना बद्दुआ थी


मरीज़े-ख़्वाब को तो अब शफ़ा है
मगर दुनिया बड़ी कड़वी दवा थी 


दर्द अपनाता है


दर्द अपनाता है पराए कौन
कौन सुनता है और सुनाए कौन

 

कौन दोहराए वो पुरानी बात
ग़म अभी सोया है जगाए कौन

 

वो जो अपने हैं क्या वो अपने हैं
कौन दुख झेले आज़माए कौन

 

अब सुकूँ है तो भूलने में है
लेकिन उस शख़्स को भुलाए कौन

 

आज फिर दिल है कुछ उदास उदास
देखिये आज याद आए कौन

 

हर ख़ुशी में कोई


हर ख़ुशी में कोई कमी-सी है
हँसती आँखों में भी नमी-सी है

 

दिन भी चुप चाप सर झुकाये था
रात की नब्ज़ भी थमी-सी है

 

किसको समझायें किसकी बात नहीं
ज़हन और दिल में फिर ठनी-सी है

 

ख़्वाब था या ग़ुबार था कोई
गर्द इन पलकों पे जमी-सी है

 

कह गए हम ये किससे दिल की बात
शहर में एक सनसनी-सी है

 

हसरतें राख हो गईं लेकिन
आग अब भी कहीं दबी-सी है


तुमको देखा तो


तुमको देखा तो ये ख़याल आया
ज़िन्दगी धूप तुम घना साया

 

आज फिर दिल ने एक तमन्ना की
आज फिर दिल को हमने समझाया

 

तुम चले जाओगे तो सोचेंगे
हमने क्या खोया, हमने क्या पाया

 

हम जिसे गुनगुना नहीं सकते
वक़्त ने ऐसा गीत क्यूँ गाया

 

इक पल गमों का


इक पल गमों का दरिया, इक पल खुशी का दरिया
रूकता नहीं कभी भी, ये ज़िन्‍दगी का दरिया

 

आँखें थीं वो किसी की, या ख़्वाब की ज़ंजीरे
आवाज़ थी किसी की, या रागिनी का दरिया

 

इस दिल की वादियों में, अब खाक उड़ रही है
बहता यहीं था पहले, इक आशिकी का दरिया

 

किरनों में हैं ये लहरें, या लहरों में हैं किरनें
दरिया की चाँदनी है, या चाँदनी का दरिया

 

Javed Akhtar Shayari In Hindi | जावेद अख्तर की शायरी


क्‍यों डरें ज़िन्‍दगी में


क्‍यों डरें ज़िन्‍दगी में क्‍या होगा
कुछ ना होगा तो तज़रूबा होगा

 

हँसती आँखों में झाँक कर देखो
कोई आँसू कहीं छुपा होगा


इन दिनों ना-उम्‍मीद सा हूँ मैं
शायद उसने भी ये सुना होगा

 

देखकर तुमको सोचता हूँ मैं
क्‍या किसी ने तुम्‍हें छुआ होगा


आज मैंने अपना


आज मैंने अपना फिर सौदा किया
और फिर मैं दूर से देखा किया

 

ज़िन्‍दगी भर मेरे काम आए असूल
एक एक करके मैं उन्‍हें बेचा किया

 

कुछ कमी अपनी वफ़ाओं में भी थी
तुम से क्‍या कहते कि तुमने क्‍या किया

 

हो गई थी दिल को कुछ उम्‍मीद सी
खैर तुमने जो किया अच्‍छा किया


आप भी आइए


आप भी आइए हमको भी बुलाते रहिए
दोस्‍ती ज़ुर्म नहीं दोस्‍त बनाते रहिए।

 

ज़हर पी जाइए और बाँटिए अमृत सबको
ज़ख्‍म भी खाइए और गीत भी गाते रहिए।

 

वक्‍त ने लूट लीं लोगों की तमन्‍नाएँ भी,
ख़्वाब जो देखिए औरों को दिखाते रहिए।

 

शक्‍ल तो आपके भी ज़हन में होगी कोई,
कभी बन जाएगी तसवीर बनाते रहिए।


Javed Akhtar Shayari In Hindi | जावेद अख्तर की शायरी


तमन्‍ना फिर मचल जाए


तमन्‍ना फिर मचल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ
यह मौसम ही बदल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ

 

मुझे गम है कि मैने जिन्‍दगी में कुछ नहीं पाया
ये ग़म दिल से निकल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ

 

नहीं मिलते हो मुझसे तुम तो सब हमदर्द हैं मेरे
ज़माना मुझसे जल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ

 

ये दुनिया भर के झगड़े, घर के किस्‍से, काम की बातें
बला हर एक टल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ


यही हालात इब्तदा


यही हालात इब्तदा से रहे
लोग हमसे ख़फ़ा-ख़फ़ा-से रहे

 

बेवफ़ा तुम कभी न थे लेकिन
ये भी सच है कि बेवफ़ा-से रहे

 

इन चिराग़ों में तेल ही कम था
क्यों गिला फिर हमें हवा से रहे

 

बहस, शतरंज, शेर, मौसीक़ी
तुम नहीं रहे तो ये दिलासे रहे

 

उसके बंदों को देखकर कहिये
हमको उम्मीद क्या ख़ुदा से रहे

 

ज़िन्दगी की शराब माँगते हो
हमको देखो कि पी के प्यासे रहे

 

Javed Akhtar Shayari In Hindi | जावेद अख्तर की शायरी


मिसाल इसकी कहाँ

 

मिसाल इसकी कहाँ है ज़माने में
कि सारे खोने के ग़म पाये हमने पाने में

 

वो शक्ल पिघली तो हर शै में ढल गई जैसे
अजीब बात हुई है उसे भुलाने में

 

जो मुंतज़िर न मिला वो तो हम हैं शर्मिंदा
कि हमने देर लगा दी पलट के आने में

 

लतीफ़ था वो तख़य्युल से, ख़्वाब से नाज़ुक
गँवा दिया उसे हमने ही आज़माने में

 

समझ लिया था कभी एक सराब को दरिया
पर एक सुकून था हमको फ़रेब खाने में

 

झुका दरख़्त हवा से, तो आँधियों ने कहा
ज़ियादा फ़र्क़ नहीं झुक के टूट जाने में


जाते जाते वो मुझे


जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया
उम्र भर दोहराऊँगा ऐसी कहानी दे गया

 

उससे मैं कुछ पा सकूँ ऐसी कहाँ उम्मीद थी
ग़म भी वो शायद बरा-ए-मेहरबानी दे गया

 

सब हवायें ले गया मेरे समंदर की कोई
और मुझ को एक कश्ती बादबानी दे गया

 

ख़ैर मैं प्यासा रहा पर उस ने इतना तो किया
मेरी पलकों की कतारों को वो पानी दे गया

 

Javed Akhtar Shayari In Hindi | जावेद अख्तर की शायरी


जिधर जाते हैं सब 


जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता
मुझे पामाल रस्तों का सफ़र अच्छा नहीं लगता


 

ग़लत बातों को ख़ामोशी से सुनना हामी भर लेना
बहुत हैं फ़ाएदे इस में मगर अच्छा नहीं लगता

 

मुझे दुश्मन से भी ख़ुद्दारी की उम्मीद रहती है
किसी का भी हो सर क़दमों में सर अच्छा नहीं लगता

 

बुलंदी पर उन्हें मिट्टी की ख़ुश्बू तक नहीं आती
ये वो शाख़ें हैं जिन को अब शजर अच्छा नहीं लगता

 

ये क्यूँ बाक़ी रहे आतिश-ज़नो ये भी जला डालो
कि सब बे-घर हों और मेरा हो घर अच्छा नहीं लगता


याद उसे भी एक अधूरा


याद उसे भी एक अधूरा अफ़्साना तो होगा
कल रस्ते में उस ने हम को पहचाना तो होगा

 

डर हम को भी लगता है रस्ते के सन्नाटे से
लेकिन एक सफ़र पर ऐ दिल अब जाना तो होगा


कुछ बातों के मतलब हैं और कुछ मतलब की बातें
जो ये फ़र्क़ समझ लेगा वो दीवाना तो होगा


दिल की बातें नहीं है तो दिलचस्प ही कुछ बातें हों
ज़िंदा रहना है तो दिल को बहलाना तो होगा

 

जीत के भी वो शर्मिंदा है हार के भी हम नाज़ाँ
कम से कम वो दिल ही दिल में ये माना तो होगा


दिल का हर दर्द


दिल का हर दर्द खो गया जैसे
मैं तो पत्थर का हो गया जैसे

 

दाग़ बाक़ी नहीं कि नक़्श कहूँ
कोई दीवार धो गया जैसे

 

जागता ज़ेहन ग़म की धूप में था
छाँव पाते ही सो गया जैसे

 

देखने वाला था कल उस का तपाक
फिर से वो ग़ैर हो गया जैसे

 

कुछ बिछड़ने के भी तरीक़े हैं
ख़ैर जाने दो जो गया जैसे


मैं पा सका न कभी


मैं पा सका न कभी इस ख़लिश से छुटकारा
वो मुझ से जीत भी सकता था जाने क्यूँ हारा

 

बरस के खुल गए आँसू निथर गई है फ़ज़ा
चमक रहा है सर-ए-शाम दर्द का तारा

 

किसी की आँख से टपका था इक अमानत है
मिरी हथेली पे रक्खा हुआ ये अँगारा

 

जो पर समेटे तो इक शाख़ भी नहीं पाई
खुले थे पर तो मिरा आसमान था सारा

 

वो साँप छोड़ दे डसना ये मैं भी कहता हूँ
मगर न छोड़ेंगे लोग उस को गर न फुन्कारा

 

Javed Akhtar Shayari In Hindi | जावेद अख्तर की शायरी


ख़्वाब के गाँव में

ख़्वाब के गाँव में पले हैं हम
पानी छलनी में ले चले हैं हम

 

छाछ फूंकें कि अपने बचपन में
दूध से किस तरह जले हैं हम

 

ख़ुद हैं अपने सफ़र की दुश्वारी
अपने पैरों के आबले हैं हम

 

तू तो मत कह हमें बुरा दुनिया
तू ने ढाला है और ढले हैं हम

 

क्यूँ हैं कब तक हैं किस की ख़ातिर हैं
बड़े संजीदा मसअले हैं हम


वो ढल रहा है


वो ढल रहा है तो ये भी रंगत बदल रही है
ज़मीन सूरज की उँगलियों से फिसल रही है

 

जो मुझ को ज़िंदा जला रहे हैं वो बे-ख़बर हैं
कि मेरी ज़ंजीर धीरे धीरे पिघल रही है

 

मैं क़त्ल तो हो गया तुम्हारी गली में लेकिन
मिरे लहू से तुम्हारी दीवार गल रही है

 

न जलने पाते थे जिस के चूल्हे भी हर सवेरे
सुना है कल रात से वो बस्ती भी जल रही है

 

मैं जानता हूँ कि ख़ामुशी में ही मस्लहत है
मगर यही मस्लहत मिरे दिल को खल रही है


कभी तो इंसान ज़िंदगी की करेगा इज़्ज़त
ये एक उम्मीद आज भी दिल में पल रही है




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          Javed Akhtar Shayari In Hindi | जावेद अख्तर की शायरी Javed Akhtar Shayari In Hindi | जावेद अख्तर की शायरी Reviewed by Feel neel on December 03, 2019 Rating: 5

          1 comment:

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