Ahmad Faraz Shayari In Hindi | अहमद फ़राज़ की शायरी

 

Ahmad Faraz Shayari In Hindi | अहमद फ़राज़ की शायरी

  • Ahmad Faraz Shayari In Hindi | अहमद फ़राज़ की शायरी

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिले

 

Ab Ke Hum Bichre Toh Shayad Kabhi Khwabon Me Mile

Jis Tarah Sookhe Hue Pholl Kitaabon Me Mile


आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा
वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा


Aankho Se Door N Ho Dil Se Utar Jayega

Wakt Ka Kya Hai Guzarata hai Guzar Jayega


ज़िंदगी से यही गिला है मुझे
तू बहुत देर से मिला है मुझे


इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँ
क्यूँ न ऐ दोस्त हम जुदा हो जाएँ


और 'फ़राज़' चाहिएँ कितनी मोहब्बतें तुझे
माओं ने तेरे नाम पर बच्चों का नाम रख दिया


हम को अच्छा नहीं लगता कोई हमनाम तिरा
कोई तुझ सा हो तो फिर नाम भी तुझ सा रक्खे


किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल
कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा


अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम
ये भी बहुत है तुझ को अगर भूल जाएँ हम


Ahmad Faraz Shayari In Hindi | अहमद फ़राज़ की शायरी
 

बंदगी हम ने छोड़ दी है 'फ़राज़'
क्या करें लोग जब ख़ुदा हो जाएँ

 

उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ
अब क्या कहें ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ

 

चला था ज़िक्र ज़माने की बेवफ़ाई का
सो आ गया है तुम्हारा ख़याल वैसे ही


कुछ इस तरह से गुज़ारी है ज़िंदगी जैसे
तमाम उम्र किसी दूसरे के घर में रहा


ढूँड उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती
ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें


न मंज़िलों को न हम रहगुज़र को देखते हैं
अजब सफ़र है कि बस हम-सफ़र को देखते हैं


तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल
हार जाने का हौसला है मुझे


दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला
वही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला


ऐसा है कि सब ख़्वाब मुसलसल नहीं होते
जो आज तो होते हैं मगर कल नहीं होते


भरी बहार में इक शाख़ पर खिला है गुलाब
कि जैसे तू ने हथेली पे गाल रक्खा है


जब भी दिल खोल के रोए होंगे
लोग आराम से सोए होंगे


न शब ओ रोज़ ही बदले हैं न हाल अच्छा है
किस बरहमन ने कहा था कि ये साल अच्छा है


सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं


अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं
'फ़राज़' अब ज़रा लहजा बदल के देखते हैं


तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है
ये जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो


तेरा क़ुर्ब न बादा है क्या किया जाए
फिर आज दुख भी ज़ियादा है क्या किया जाए


Ahmad Faraz Shayari 2 Lines


अजब जूनून-ए-मुसाफ़त में


अजब जूनून-ए-मुसाफ़त में घर से निकला था
ख़बर नहीं है कि सूरज किधर से निकला था


Ajab Junoon-E- Musafat Me Ghar Se Nikla Tha
Khabar Nahi Hai Ki Suraj Kidhar Se Nikla Tha

 

ये कौन फिर से उन्हीं रास्तों में छोड़ गया,
अभी अभी तो अज़ाब-ए-सफ़र से निकला था


Ye Kaun Phir Se Unhi Raasto Me Chor Gaya
Abhi Abhi To Ajaab-E-Safar Se Nikla Tha

 

ये तीर दिल में मगर बे-सबब नहीं उतरा
कोई तो हर्फ़ लब-ए-चारागर से निकला था


Ye Teer Dil Me Magar Be-Sabab Nahi Utra
Koi Toh Harf Lab-E-Charagaar Se Nikla Tha

 

मैं रात टूट के रोया तो चैन से सोया,
कि दिल का दर्द मेरे चश्म-ए-तर से निकला था


Mai Raat Toot Ke Soya To Chain Se Soya
Ki Dil Ka Dard Mere Chashm-E-Tar Se Nikla Tha

 

वो कैसे अब जिसे मजनू पुकारते हैं ‘फ़राज़’
मेरी तरह कोई दिवाना-गर से निकला था


Wo Kaise Ab Jise Majnoo Pukarte Hai "Faraaz"
Meri Tarah Koi Deewana - Gr Se Nikla Tha


Ahmad Faraz Shayari Hindi

 

अब के रुत बदली तो


अब के रुत बदली तो ख़ुशबू का सफ़र देखेगा कौन
ज़ख़्म फूलों की तरह महकेंगे पर देखेगा कौन


Ab Ke Rut Badli To, Khusbu Ka Safar Dekhega Kahun
Zakhm Phoolo Ki Tarah Mahkenge Par Dekhega Kaun

 

देखना सब रक़्स-ए-बिस्मल में मगन हो जाएँगे
जिस तरफ़ से तीर आयेगा उधर देखेगा कौन


Dekhna Sab Raqs-E- Bismil Me Magan Ho Jayenge
Jis Taraf Se Teer Ayega Udhar Dekhega Kaun

 

वो हवस हो या वफ़ा हो बात महरूमी की है
लोग तो फल-फूल देखेंगे शजर देखेगा कौन


Wo Hawas Ho Ya Wafa Ho Baat Mehroomi Ki Hai
Log To Fal-phool Dekhenge Shajar Dekhega Kaun

 

हम चिराग़-ए-शब ही जब ठहरे तो फिर क्या सोचना
रात थी किस का मुक़द्दर और सहर देखेगा कौन


Hum Chiraag-E-Shab Hi Jab Thehre To Phir Kya Sochna
Raat Thi Kis Kaa Muqaddar Aur Sehar Dekhega Kaun

 

आ फ़सील-ए-शहर से देखें ग़नीम-ए-शहर को
शहर जलता हो तो तुझ को बाम पर देखेगा कौन


Aa Faseel-E-Shehar Se Dekhe Ganeem-E-Shehar Ko
Jalta Shehar Ho To Tujh Ko Baam Par Dekhega Kaun

 

अब नये साल की मोहलत


अब नये साल की मोहलत नहीं मिलने वाली
आ चुके अब तो शब-ओ-रोज़ अज़ाबों वाले


Ab Naye Saal Ki Mohlat Nahi Milne Waali
Aa chuke Ab To shab-O-Roz Ajaabo Waale

 

अब तो सब दश्ना-ओ-ख़ंज़र की ज़ुबाँ बोलते हैं
अब कहाँ लोग मुहब्बत के निसाबों वाले


Ab To Sab Dashna-O-Khanjar Ki Jubaan Bolte Hai
Ab Kaha Log Mohabbat Ke Nisabo waale

 

ज़िन्दा रहने की तमन्ना हो तो हो जाते हैं
फ़ाख़्ताओं के भी किरदार उक़ाबों वाले


Zinda Rehne Ki Tamanna Ho To Ho Jaate Hai
Faakhtao Ke Bhi Kirdaar Ukaabo Waale

 

न मेरे ज़ख़्म खिले हैं न तेरा रंग-ए-हिना
मौसम आये ही नहीं अब के गुलाबों वाले


N Mere Zakhm Khile Hai N Tera Rang-E-Hina
Mausam Aaye Hi Nahi Ab Ke Gulaabo Waale

 

आँख से दूर न हो


आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा
वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा


इतना मानूस न हो ख़िल्वत-ए-ग़म से अपनी
तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जाएगा


तुम सर-ए-राह-ए-वफ़ा देखते रह जाओगे
और वो बाम-ए-रफ़ाक़त से उतर जाएगा

 

किसी ख़ंज़र किसी तलवार को तक़्लीफ़ न दो
मरने वाला तो फ़क़त बात से मर जाएगा

 

ज़िन्दगी तेरी अता है तो ये जानेवाला
तेरी बख़्शीश तेरी दहलीज़ पे धर जाएगा

 

डूबते-डूबते कश्ती को उछाला दे दूँ
मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जाएगा

 

ज़ब्त लाज़िम है मगर दुख है क़यामत का "फ़राज़"
ज़ालिम अब के भी न रोयेगा तो मर जाएगा

 

Ankh Se Door Na Ho


Ankh Se Door Na Ho Dil Se Utar Jayega
Wakt Ka Kya Hai Guzarta Hai Guzar Jayega

 

Itna Manoos Na Ho Khilwat-E-Gum Se Apni
Tu Kabhi Khud Ko Bhi Dekhega To Darr Jayega

 

Tum Sar-E-Raah-E Wafa Dekhte Reh Jaaoge
Aur Wo Baam-E-Rafaqat Se Utar Jayega

 

Kisi Khanjar Kisi Talwaar Ko Takleef Naa Do
Marne Waala To Fakat Baat Se Mar Jayega

 

Zindgi Teri Ata Hai To Ye Jaane waala
Teri Bakhshish Teri Dehleej Pe Dhara Reh Jayega

 

Doobte-Doobte Kashti Ko Uchala De Du
Mai Nahi Koi To Sahil Pe Utar Jayega

 

Zabt Lazim Hai Magar Dukh Hai Kayamat Ka "Faraaz"
Zaalim Ab Ke Bhi Na Royega Toh Mar Jayega

 

इस क़दर मुसलसल थीं

 

इस क़दर मुसलसल थीं शिद्दतें जुदाई की
आज पहली बार उससे मैनें बेवफ़ाई की

 

वरना अब तलक यूँ था ख़्वाहिशों की बारिश में
या तो टूट कर रोया या ग़ज़लसराई की

 

तज दिया था कल जिन को हमने तेरी चाहत में
आज उनसे मजबूरन ताज़ा आशनाई की

 

हो चला था जब मुझको इख़्तिलाफ़ अपने से
तूने किस घड़ी ज़ालिम मेरी हमनवाई की

 

तन्ज़-ओ-ताना-ओ-तोहमत सब हुनर हैं नासेह के
आपसे कोई पूछे हमने क्या बुराई की

 

फिर क़फ़स में शोर उठा क़ैदियों का और सय्याद
देखना उड़ा देगा फिर ख़बर रिहाई की

 

Is Qadar Musalsal Thi Shiddte Judaai Ki
Aaj Pehli Baar Usase Maine Bewafai Ki


Warna Ab Talak Yu Tha Khwahishon Ki Baarish Me
Yaa Toh Toot Kar Roya Ya Ghazal-Saraai Ki


Tj Diya Tha Kal Jinko Humne Teri Chahat Me
Aaj Unse Majbooran Taaza Aasnaai Ki


Ho Chala Tha Jab Mujhko Ikhtilaaf Apne Se
Tune Kis Ghari Zaalim Meri Humnawaai Ki


Tanj-O-Taana-O-Tohmat Sab Hunar Hai Naseh Ke
Aapse Koi Puche Humne Kya Buraai Ki


Phir Kafas Me Shor Utha Kaidiyon Kaa Aur Sayaad
Dekhna Uda Dega Phir Khabar Rihaai Ki


06


इस से पहले कि बेवफ़ा हो जाएँ
क्यूँ न ए दोस्त हम जुदा हो जाएँ


तू भी हीरे से बन गया पत्थर
हम भी कल जाने क्या से क्या हो जाएँ


हम भी मजबूरियों का उज़्र करें
फिर कहीं और मुब्तिला हो जाएँ


अब के गर तू मिले तो हम तुझसे
ऐसे लिपटें तेरी क़बा हो जाएँ


बंदगी हमने छोड़ दी फ़राज़
क्या करें लोग जब ख़ुदा हो जाएँ


Is Se Pehle Ki Bewafa Ho Jaye
Q Na A Dost Hum Juda Ho Jaye


Tu Bhi Heere Se Ban Gaya Patthar
Kal Bhi Jaane Kya Se Kya Ho Jaye


Hum Bhi Majbooriyon Ka Ujr Kare
Phir Kahi Aur Mubtila Ho Jaye


Ab Ke Gr Tu Mile To Hum Tujhse
Teri Lipte Teri Kabaa Ho Jaaye


Bandgi Humne Chor Si "Faraaz"
Kya Kare Jab Log Khuda Ho Jaye


07


उसको जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ
अब क्या कहें ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ


ढलती न थी किसी भी जतन से शब-ए-फ़िराक़
ऐ मर्ग-ए-नागहाँ तेरा आना बहुत हुआ


हम ख़ुल्द से निकल तो गये हैं पर ऐ ख़ुदा
इतने से वाक़ये का फ़साना बहुत हुआ


अब हम हैं और सारे ज़माने की दुश्मनी
उससे ज़रा रब्त बढ़ाना बहुत हुआ


अब क्यों न ज़िन्दगी पे मुहब्बत को वार दें
इस आशिक़ी में जान से जाना बहुत हुआ


अब तक तो दिल का दिल से तार्रुफ़ न हो सका
माना कि उससे मिलना मिलाना बहुत हुआ


क्या-क्या न हम ख़राब हुए हैं मगर ये दिल
ऐ याद-ए-यार तेरा ठिकाना बहुत हुआ


कहता था नासेहों से मेरे मुँह न आईओ
फिर क्या था एक हू का बहाना बहुत हुआ


लो फिर तेरे लबों पे उसी बेवफ़ा का ज़िक्र
अहद "फ़राज़" तुझसे कहा ना बहुत हुआ


Usase Juda Hue Bhi Jamana Bahut Hua
Ab Kya Kahe Ye Kissa Purana Bahut Hua


Dhalti Na Thi Kisi Bhi Jatan Se Shab-E-Firaak
Ae Marg-E-Naaghaan Tera Aana Bahut Hua


Hum Khuld Se Nikal Toh Gaye Hai Par Ae Khuda
Itne Se Wakaye Ka Fasana Bahut Hua


Ab Hum Hai Aur Saare Jamane Ki Dushmani
Usase Zara Rabt Badhana Bahut Hua


Ab Kyo Na Zindgi Pe Mohabbat Ko Waar De
Is Ashiqui Me Jaan Se Jana Bahut Hua


Ab Tak To Dil Ka Dil Se Taruf Na Ho Saka
Maana Ki Usase Milna Milaana Bahut Hua


Kya- Kya N Hum Kharaab Hue Hai Magar Ye Dil
Ae Yaad-E-Yaar Tera Thikana Bahut Hua


Kehta Tha Nasehon Se Mere Muhh N Aaiyyo
Phir Kya Tha Ek Hoon Ka Bahana Bahut Hua


Lo Phir Tere Labon Pe Usi Bewafa Kaa Jikr
Ahad "Faraaz" Tujhse Kaha Naa Bahut Hua


08


एक बार ही जी भर के सज़ा क्यूँ नहीं देते?
मैं हर्फ़-ए-ग़लत हूँ तो मिटा क्यूँ नहीं देते?


जब प्यार नहीं है तो भुला क्यों नहीं देते?
ख़त किसलिए रखे हैं जला क्यों नहीं देते?


मोती हूँ तो दामन में पिरो लो मुझे अपने,
आँसू हूँ तो पलकों से गिरा क्यूँ नहीं देते?


लिल्लाह शब-ओ-रोज़ की उलझन से निकालो
तुम मेरे नहीं हो तो बता क्यों नहीं देते?


अब शिद्दते ग़म से मेरा दम घुटने लगा है
तुम रेशमी ज़ुल्फों की हवा क्यों नहीं देते


रह रह के न तड़पाओ ऐ बेदर्द मसीहा
हाथों से मुझे ज़हर पिला क्यों नहीं देते ?


जब मेरी वफाओं पे यकीं तुमको नहीं है
तो मुझको निगाहों से गिरा क्यों नहीं देते?


साया हूँ तो साथ ना रखने का सबब क्या 'फ़राज़',
पत्थर हूँ तो रास्ते से हटा क्यूँ नहीं देते?


Ek Baar Hi Ji Bhar Ke Saza Kyu Nahi Dete
Mai Harf-E-Galat Hoon Toh Mita Kyu Nahi Dete


Jab Pyaar Nahi Hai Toh Bhula Kyo Nahi Dete
Khat Kisliye Rakhe Hai Jala Kyi Nahi Dete


Moti Hoon Toh Daman Me Piro Lo Mujhe Apne
Aansu Hu Toh Palko Se Gira Kyu Nahi Dete


Lillah Shab-O-Roz Ki Uljhan Se Nikaalo
Tum Mere Nahi Ho To Bata Kyu Nahi Dete


Ab Shiddate Gum Se Mera Dum Ghutne Laga Hai
Tum Reshami Zulfo Ki Hawa Kyu Nahi Dete


Reh - Reh Ke Tadpaao Na Ae Bedard Masihaa
Hatho Se Mujhe Zehar Pila Kyu Nahi Dete


Jab Meri Wafao Par Yakeen Tumko Nahi Hai
Toh Mujhko Nigaaho Se Gira Kyu Nahi Dete


Saaya Hoon Toh Sath N Rakhne Kaa Sabab "Faraaz"
Patthar Hoon Toh Raste Se Hata Kyu Nahi Dete


09


ऐसे चुप हैं कि ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे
तेरा मिलना भी जुदाई कि घड़ी हो जैसे


अपने ही साये से हर गाम लरज़ जाता हूँ
रास्ते में कोई दीवार खड़ी हो जैसे


मंज़िलें दूर भी हैं मंज़िलें नज़दीक भी हैं
अपने ही पावों में ज़ंजीर पड़ी हो जैसे


तेरे माथे की शिकन पहले भी देखी थी मगर
यह गिरह अब के मेरे दिल पे पड़ी हो जैसे


कितने नादान हैं तेरे भूलने वाले कि तुझे
याद करने के लिये उम्र पड़ी हो जैसे


आज दिल खोल के रोये हैं तो यूँ ख़ुश हैं "फ़राज़"
चंद लम्हों की ये राहत भी बड़ी हो जैसे


Aise Chup Hai Ki Ye Manzil Bhi Kadi Ho Jaise
Tera Milna Bhi Judaai Ki Ghadi Ho Jaise


Apne Hi Saaye Se Har Gaam Laraz Jaata Hoon
Raste Me Koi Deewar Khadi Ho Jaise


Manzil Door Bhi Hai Manzil Najdik Bhi Hai
Apne Hi Paon Me Zanjeer Padi Ho Jaise


Tere Mathe Ki Shikan Pehle Bhi Dekhi Thi Magar
Yeh Girah Ab Ke Mere Dil Pe Padi Ho Jaise


Kitne Nadaan Hai Tere Bhoolne Waale Ki Tujhe
Yaad Karne Ke Liye Umr Padi Ho Jaise


Aaj Dil Khol Ke Royen Hai Toh Yu Khush Hai "Faraaz"
Chand Lamho Ki Ye Rahat Bhi Badi Ho Jaise


10


कठिन है राहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो
बहुत बड़ा है सफ़र थोड़ी दूर साथ चालो


तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है
मैं जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो


नशे में चूर हूँ मैं भी तुम्हें भी होश नहीं
बड़ा मज़ा हो अगर थोड़ी दूर साथ चलो


ये एक शब की मुलाक़ात भी ग़नीमत है
किसे है कल की ख़बर थोड़ी दूर साथ चलो


अभी तो जाग रहे हैं चिराग़ राहों के
अभी है दूर सहर थोड़ी दूर साथ चलो


तवाफ़-ए-मन्ज़िल-ए-जानाँ हमें भी करना है
"फ़राज़" तुम भी अगर थोड़ी दूर साथ चलो


Kathin Hai Rahguzar Thodi Door Sath Chalo
Bahut Bada Hai Safar Thodi Door Sath Chalo


Tamaam Umr Kaha Koi Sath Deta Hai
Mai Jaanta Hoon Magar Thodi Door Satha Chalo


Nashe Me Choor Hoon Mai Bhi Tumhe Bhi Hosh Nahi
Bada Maza Ho Agar Thodi Door Sath Chalo


Ye Ek Shab Ki Mulakaat Bhi Ganimat Hai
Kise Hai Kal Ki Khabar Thodi Door Sath Chalo


Abhi Toh Jaag Rahe Hai Chiraag Raahon Ke
Abhi Hai Door Sehar Thodi Door Sath Chalo


Tawaaf-E-Manzil-E-Jaana Hme Bhi Karna Hai
"Faraaz" Tum Bhi Agar Thodi Door Sath Chalo


11


करूँ न याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे
ग़ज़ल बहाना करूँ और गुनगुनाऊँ उसे


वो ख़ार-ख़ार है शाख़-ए-गुलाब की मानिन्द
मैं ज़ख़्म-ज़ख़्म हूँ फिर भी गले लगाऊँ उसे


ये लोग तज़्क़िरे करते हैं अपने लोगों के
मैं कैसे बात करूँ और कहाँ से लाऊँ उसे


मगर वो ज़ूदफ़रामोश ज़ूद-रंज भी है
कि रूठ जाये अगर याद कुछ दिलाऊँ उसे


वही जो दौलत-ए-दिल है वही जो राहत-ए-जाँ
तुम्हारी बात पे ऐ नासिहो गँवाऊँ उसे


जो हमसफ़र सर-ए-मंज़िल बिछड़ रहा है "फ़राज़"
अजब नहीं कि अगर याद भी न आऊँ उसे


Karu Na Yaad Magar Kis Tarah Bhulau Use
Ghazal Bahana Karu Aur Gungunaun Use


Wo Khaar-Khaar Hai Shakh-E-Gulaab Ki Manind
Mai Zakhm-Zakhm Hoon Phir Bhi Gale Lagaun Use


Ye Log Tazkire Karte Hai Apne Logo Ke
Mai Kaise Baat Karu Aur Kaha Se Laun Use


Magar Wo Joodfaramosh Kood Ranj Bhi Hai
Ki Rooth Jaye Agar Yaad Kuch Dilaun Use


Wahi Jo Daulat-E-Dil Hai Wahi Jo Raahat-E-Jaan
Tumhari Baat Pe Ae Nasihon Gawaun Use


Jo Humsafar Sar-E-Manzil Bichad Raha Hai "Faraaz"
Ajab Nahi Ki Gar Yaad Bhi Na Aaun Use


12


किताबों में मेरे फ़साने ढूँढते हैं,
नादां हैं गुज़रे ज़माने ढूँढते हैं


जब वो थे तलाशे-ज़िंदगी भी थी,
अब तो मौत के ठिकाने ढूँढते हैं ।


कल ख़ुद ही अपनी महफ़िल से निकाला था,
आज हुए से दीवाने ढूँढते हैं ।


मुसाफ़िर बे-ख़बर हैं तेरी आँखों से,
तेरे शहर में मैख़ाने ढूँढते हैं ।


तुझे क्या पता ऐ सितम ढाने वाले,
हम तो रोने के बहाने ढूँढते हैं ।


उनकी आँखों को यूँ ना देखो ’फ़राज़’,
नए तीर हैं, निशाने ढूँढते हैं ।


Kitaabon Me Mere Fasane Dhoondhte Hai
Nadaan Hai Guzre Zamaane Dhoondhte Hai


Jab Wo The Talash-E-Zindgi Bhi Thi
Ab Toh Maut Ke Thikaane Dhoondhte Hai


Kal Khud Hi Apni Mehfil Se Nikaala Tha
Aaj Hue Se Deewane Dhoondhte Hai


Musafir Be khabar Hai Teri Ankho Se
Tere Shehar Me Maikhane Dhoondhte Hai


Tujhe Kya Pata Ae Sitam Dhaane Waale
Hum To Rone Ke Bahane Dhoondhte Hai


Unki Ankho Ko Yun Naa Dekho "Faraaz"
Naye Teer Hai Nishane Dhoondhte Hai


13


कुछ न किसी से बोलेंगे
तन्हाई में रो लेंगे


हम बेरहबरों का क्या
साथ किसी के हो लेंगे


ख़ुद तो हुए रुसवा लेकिन
तेरे भेद न खोलेंगे


जीवन ज़हर भरा साग़र
कब तक अमृत घोलेंगे


नींद तो क्या आयेगी "फ़राज़"
मौत आई तो सो लेंगे


Kuch N Kisi Se Bolenge
Tanhaai Me Ro Lenge


Hum Be Rehbaro Kaa Kya
Sath Kisi Ke Ho Lenge


Khud To Hue Ruswa Lekin
Tere Bheid N Kholenge


Jivan Zehar Bhara Sagar
Kab Tak Amrit Gholenge


Nind To Kya Ayegi "Faraaz"
Maut Aayi Toh So Lenge


14


कुर्बत भी नहीं दिल से उतर भी नहीं जाता
वो शख़्स कोई फ़ैसला कर भी नहीं जाता


आँखें हैं के खाली नहीं रहती हैं लहू से
और ज़ख्म-ए-जुदाई है के भर भी नहीं जाता


वो राहत-ए-जान है इस दरबदरी में
ऐसा है के अब ध्यान उधर भी नहीं जाता


हम दोहरी अज़ीयत के गिरफ़्तार मुसाफ़िर
पाऔं भी हैं शील शौक़-ए-सफ़र भी नहीं जाता


दिल को तेरी चाहत पर भरोसा भी बहुत है
और तुझसे बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता


पागल होते हो 'फ़राज़' उससे मिले क्या
इतनी सी ख़ुशी से कोई मर भी नहीं जाता


Kurbat Bhi Nahi Dil Se Utar Bhi Nahi Jaata
Wo Shaksh Koi Faisala Kar Bhi Nahi Jaata


Ankhe Hai Ki Khali Nahi Rehti Hai Lahu Se
Aur Zakhm-E-Judaai Hai Ki Bhar Bhi Nahi Jaata


Wo Raahat-E-Jaan Hai Is Darbadari Me
Aisa Hai Ki Ab Dhyaan Udhar Bhi Nahi Jaata


Hum Dohri Ajiyat Ke Giraftaar Musafir
Paaon Bhi Hai Sheel Shauq-e-Safar Bhi Nahi Jaata


Dil Ko Teri Chahat Par Bharosa Bhi Bahut Hai
Aur Tujhse Bichad Jaane Kaa Darr Bhi Bahut Hai


Pagal Hote Ho Faraaz Usase Mile Kya
Itni Si Khushi Se Koi Mar Bhi Nahi Jaata


15


क्या रुख़्सत-ए-यार की घड़ी थी
हँसती हुई रात रो पड़ी थी


हम ख़ुद ही हुए तबाह वरना
दुनिया को हमारी क्या पड़ी थी


ये ज़ख़्म हैं उन दिनों की यादें
जब आप से दोस्ती बड़ी थी


जाते तो किधर को तेरे वहशी
ज़न्जीर-ए-जुनूँ कड़ी पड़ी थी


ग़म थे कि "फ़राज़" आँधियाँ थी
दिल था कि "फ़राज़" पन्खुदई थी


Kya Rukhsat-E-Yaar Ki Ghari Thi
Hasati Hui Raat Ro Padi Thi


Hum Khud Hi Hue Tabaah Warna
Duniya Ko Hamari Kya Padi Thi


Ye Zakhm Hai Un Dino Ki Yaadein
Jab Aap Se Dosti Badi Thi


Jaate To Kidhar Ko Tere Wahshi
Zanjeer-E-Junoon Kadi Padi Thi


Gum The Ki "Faraaz" Andhiya Thi
Dil Tha Ki "Faraaz" Pandukhai Thi



16


क्यूँ तबीयत कहीं ठहरती नहीं
दोस्ती तो उदास करती नहीं


हम हमेशा के सैर-चश्म सही
तुझ को देखें तो आँख भरती नहीं


शब-ए-हिज्राँ भी रोज़-ए-बद की तरह
कट तो जाती है पर गुज़रती नहीं


ये मोहब्बत है, सुन, ज़माने, सुन!
इतनी आसानियों से मरती नहीं


जिस तरह तुम गुजारते हो फ़राज़
जिंदगी उस तरह गुज़रती नहीं


Kyu Tabiyat Kahi Theharti Nahi
Dosti Toh Udaas Karti Nahi


Hum Hamesha Ke Sair-Chasm Sahi
Tujhko Dekhe To Ankh Bharti Nahi


Shab-E-Hizraa Bhi Roz-E-Bd Ki Tarah
Kt To Jaati Hai Pr Guzarti Nhi


Ye Mohabbat Hai Sun Jamane Sun
Itni Aasaniyo Se Marti Nahi


Jis Tarah Guzarte Ho "Faraaz"
Zindgi Us Tarah Guzarti Nahi


17


ग़ज़ल सुन के परेशां हो गए क्या
किसी के ध्यान में तुम खो गए क्या


ये बेगाना-रवी पहले नहीं थी
कहो तुम भी किसी के हो गए क्या


ना पुरसीश को ना समझाने को आए
हमारे यार हम को रो गए क्या


अभी कुछ देर पहले तक यहीं थी
ज़माना हो गया तुमको गए क्या


किसी ताज़ा रफ़ाक़त की ललक है
पुराने ज़ख़्म अच्छे हो गए क्या


पलट कर चाराग़र क्यों आ गए हैं
शबे-फ़ुर्क़त के मारे सो गए क्या


‘फ़राज़’ इतना ना इतरा हौसले पर
उसे भूले ज़माने हो गए क्या


Ghazal Sun Ke Paresha Ho Gaye Kya
Kisi Ke Dhyaan Me Tum Kho Gaye Kya


Ye Begaana-Ravi Pehle Nahi Thi
Kaho Tum Bhi Kisi Ke Ho Gaye Ho Kya


Naa Purseesh Ko Naa Samjhane Aaye
Hamare Yaar Hamko Ro Gaye Kya


Kisi Taza Rafakat Ki Lalak Hai
Purane Zakhm Achche Ho Gaye Kya


Palat Kar Chaaragar Kyu Aa Gaye Hai
Shabe Furkat Ke Maare So Gaye Kya


"Faraaz" Itna Na Itra Hausale Par
Use Bhoole Jamane Ho Gaye Kya


18


चलो ये इश्क़ नहीं चाहने की आदत है
कि क्या करें हमें दू्सरे की आदत है


तू अपनी शीशा-गरी का हुनर न कर ज़ाया
मैं आईना हूँ मुझे टूटने की आदत है


मैं क्या कहूँ के मुझे सब्र क्यूँ नहीं आता
मैं क्या करूँ के तुझे देखने की आदत है


तेरे नसीब में ऐ दिल सदा की महरूमी
न वो सख़ी न तुझे माँगने की आदत है


विसाल में भी वो ही है फ़िराक़ का आलम
कि उसको नींद मुझे रत-जगे की आदत है


ये मुश्क़िलें हों तो कैसे रास्ते तय हों
मैं ना-सुबूर उसे सोचने की आदत है


ये ख़ुद-अज़ियती कब तक "फ़राज़" तू भी उसे
न याद कर कि जिसे भूलने की आदत है


Chalo Ye Ishq Nahi Chahat Ki Aadat Hai
Ki Kya Kare Hame Dusre Ki Aadat Hai


Tu Apni Shisha-Giri Ka Hunar Na Kar Jaaya
Mai Aaina Hai Mujhe Tootne Ki Aadat Hai


Mai Kya Kahu Ki Mujhe Sabr Kyu Nahi Aata
Mai Kya Karu K Tujhe Dekhne Ki Aadat Hai


Tere Naseeb Me Ae Dil Sada Ki Mehroomi
N Wo Sakhi N Tujhe Mangne Ki Aadat Hai


Visaal Me Bhi Wo Hi Hai Firaaq Ka Alam
Ki Usko Nind Mujhe Rat-Jage Ki Aadat Hai


Ye Mushkile Ho To Kaise Raste Tay Ho
Mai Na-Suboor Use Sochne Ki Aadat Hai


Ye Khud-Ajiyati Kab Tak Faraaz Tu Bhi Use
N Yaad Kar Jise Bhoolne Ki Aadat Hai


19


जब तेरा दर्द मेरे साथ वफ़ा करता है
एक समन्दर मेरी आँखों से बहा करता है


उसकी बातें मुझे खुश्बू की तरह लगती है
फूल जैसे कोई सहरा में खिला करता है


मेरे दोस्त की पहचान ये ही काफ़ी है
वो हर शख़्स को दानिस्ता ख़फ़ा करता है


और तो कोई सबब उसकी मोहब्बत का नहीं
बात इतनी है के वो मुझसे जफ़ा करता है


जब ख़ज़ाँ आएगी तो लौट आएगा वो भी 'फ़राज़'
वो बहारों में ज़रा कम ही मिला करता है


Jab Tera Dard Mere Sath Wafa Karta Hai
Ek Samandar Meri Ankho Se Beha Karta hai


Uski Baatein Mujhe Khusbu Ki Tarah Lagti Hai
Phool Jaise Koi Sehra Me Khila Karta Hai


Mere Dost Ki Pehchaan Ye Hi Kaafi Hai
Wo Har Shakhsh Ko Danista Khafa Karta Hai


Aur To Koi Sabab Uski Mohabbat Ka Nahi
Baat Itni Hai Ki Wo Mujhse Zafa Karta Hai


Jab Khazaa Ayengi Toh Laut Ayega Wo Bhi "Faraaz"
Wo Baharo Me Zara Kam Hi Mila Karta Hai


20


ज़िन्दगी यूँ थी कि जीने का बहाना तू था
हम फ़क़त जेबे-हिकायत थे फ़साना तू था


हमने जिस जिस को भी चाहा तेरे हिज्राँ में वो लोग
आते जाते हुए मौसम थे ज़माना तू था


अबके कुछ दिल ही ना माना के पलट कर आते
वरना हम दरबदरों का तो ठिकाना तू था


यार अगियार कि हाथों में कमानें थी फ़राज़
और सब देख रहे थे कि निशाना तू था


Zindgi Yu Thi Ki Jeene Ka Bahana Tu Tha
Hum Fakat Jebein-Hiqayat The Fasaana Tu Tha


Humne Jis Jis Ko Bhi Chaaha Tere Hizraa Me Wo Log
Aaate Jaate Hue Mausam The Jamana Tu Tha


Ab Ke Kuch Dil Hi Na Maana K Palat Kar Aate
Warna Hum Darbadro Ka To Thikana Tu Tha


Yaar Agiyaar Ki Hathon Me kamanein Thi "Faraaz"
Aur Sab Dekh Rahe The Ki Nishaana Tu Tha


21


ज़िन्दगी से यही गिला है मुझे
तू बहुत देर से मिला है मुझे


हमसफ़र चाहिये हुजूम नहीं
इक मुसाफ़िर भी काफ़िला है मुझे


तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल
हार जाने का हौसला है मुझे


लब कुशां हूं तो इस यकीन के साथ
कत्ल होने का हौसला है मुझे


दिल धडकता नहीं सुलगता है
वो जो ख्वाहिश थी, आबला है मुझे


कौन जाने कि चाहतो में फ़राज़
क्या गंवाया है क्या मिला है मुझे


Zindagi Se Yahi Gila Hai Mujhe
Tu Bahut Der Se Mila Hai Mujhe


Humsafar Chahiye Hujum Nahi
Ik Musafir Bhi Kaafila Hai Mujhe


Tu Mohabbat Se Koi Chaal To Chal
Haar Jaane Kaa Hausla Hai Mujhe


Lab Kushaan Hoon Toh Is Yakeen Ke Sath
Katl Hone Ka Hausla Hai Mujhe


Dil Dhadakta Nahi Sulagta Hai
Wo Jo Khwahish Thi Aabla Hai Mujhe


Kaun Jaane Ki Chahto Me "Faraaz"
Kya Gavaaya Hai Kya Mila Hai Mujhe


22


तड़प उठूँ भी तो ज़ालिम तेरी दुहाई न दूँ
मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हूँ फिर भी तुझे दिखाई न दूँ


तेरे बदन में धड़कने लगा हूँ दिल की तरह
ये और बात के अब भी तुझे सुनाई न दूँ


ख़ुद अपने आपको परखा तो ये नदामत है
के अब कभी उसे इल्ज़ाम-ए-बेवफ़ाई न दूँ


मुझे भी ढूँढ कभी मह्व-ए-आईनादारी
मैं तेरा अक़्स हूँ लेकिन तुझे दिखाई न दूँ


 

Tadap Uthu Bhi Toh Zaalim


Tadap Uthu Bhi Toh Zaalim Teri Duhaai N Du
Mai Zakhm-Zakhm Hoon Phir Bhi Tujhe Dikhaai N Du


Tere Badan Me Dhadkane Laga Hoon Dil Ki Tarah
Ye Aur Baat Hai K Ab Bhi Tujhe Dikhai N Du


Khud Apne Aap Ko Parkha Toh Ye Nadamat Hai
K Ab Kabhi Use Ilzaam--E-Bewafaai N Du


Mujhe Bhi Dhoondh Kabhi Mahm-E-Aainadaari
Mai Tera Aks Hoon Lekin Tujhe Dikhai N Du


23


तुझ पर भी न हो गुमान मेरा
इतना भी कहा न मान मेरा


मैं दुखते हुये दिलों का ईशा
और जिस्म लहुलुहान मेरा


कुछ रौशनी शहर को मिली तो
जलता है जले मकान मेरा


ये जात ये कायनात क्या है
तू जान मेरी जहान मेरा


जो कुछ भी हुआ यही बहुत है
तुझको भी रहा है ध्यान मेरा


Tujh Par Bhi N Ho Gumaan Mera
Itna Bhi Kaha N Maan Mera


Mai Dukhte Hue Dilo Ka isha
Aur Jism Lahuluhaan Mera


Kuch Roshani Shehar Ko Mili Toh
Jalta Hai Jale Makaan Mera


Ye Jaat Ye Kaaynaat Kya Hai
Tu Jaan Meri Jahaan Mera


Jo Kuch Bhi Hua Yahi Bahut Hai
Tujhko Bhi Raha Hai Dhyaan Mera


24


तुझसे बिछड़ के हम भी मुकद्दर के हो गये
फिर जो भी दर मिला है उसी दर के हो गये


फिर यूँ हुआ के गैर को दिल से लगा लिया
अंदर वो नफरतें थीं के बाहर के हो गये


क्या लोग थे के जान से बढ़ कर अजीज थे
अब दिल से मेह नाम भी अक्सर के हो गये


ऐ याद-ए-यार तुझ से करें क्या शिकायतें
ऐ दर्द-ए-हिज्र हम भी तो पत्थर के हो गये


समझा रहे थे मुझ को सभी नसेहान-ए-शहर
फिर रफ्ता रफ्ता ख़ुद उसी काफिर के हो गये


अब के ना इंतेज़ार करें चारगर का हम
अब के गये तो कू-ए-सितमगर के हो गये


रोते हो एक जजीरा-ए-जाँ को "फ़राज़" तुम
देखो तो कितने शहर समंदर के हो गये


Tujhse Bichad Ke Hum Bhi Muqaddar Ke Ho Gaye
Phir Jo Bhi Dar Mila Hai Usi Dar Ke Ho Gaye


Phir Yu Hua K Gair Ko Dil Se Laga Liya
Andar Wo Nafrate Thi K Bahar K Ho Gaye


Kya Log The K Jaan Se Badhkar Ajeez The
Ab Dil Se Meh Naam Bhi Aksar K Ho Gaye


Ae Yaad-E-Yaar Tujhase Kare Kya Shikayatein
Ae Dard-E-Hizr Hum Bhi Toh Patthar K Ho Gaye


Samjha Rahe The Mujhko Sabhi Nasehaan-E-Shehar
Phir Rafta-Rafta Khud Usi Kaafir K Ho Gaye


Ab K Na Intezaar Kare Chaaragar Ka Hum
Ab K Gaye Toh Koo-E-Sitamgar K Ho Gaye


Rote Ho Ek Jajeera-A-Jaan Ko "Faraaz" Tum
Dekho To Kitne Shehar Samandar Ho Gaye


25


तू पास भी हो तो दिल बेक़रार अपना है
के हमको तेरा नहीं इंतज़ार अपना है


मिले कोई भी तेरा ज़िक्र छेड़ देते हैं
के जैसे सारा जहाँ राज़दार अपना है


वो दूर हो तो बजा तर्क-ए-दोस्ती का ख़याल
वो सामने हो तो कब इख़्तियार अपना है


ज़माने भर के दुखों को लगा लिया दिल से
इस आसरे पे के इक ग़मगुसार अपना है


"फ़राज़" राहत-ए-जाँ भी वही है क्या कीजे
वो जिस के हाथ से सीनाफ़िग़ार अपना है


Tu Paas Bhi Toh Dil Bekarar Apna Hai
K Humko Tera Nahi Intezaar Apna Hai


Mile Koi Bhi Tera Zikr Ched Dete Hai
K Jaise Sara Jahaan Raazdaar Apna Hai


Wo Door Ho Toh Baja Tark-E-Dosti Ka Khayal
Wo Samne Ho Toh Kab Ikhtiyaar Apna Hai


Jamane Bhar Ke Dukho Ko Laga Liya Dil Se
Is Aasre Pe K Ik Gum-Gusaar Apna Hai


"Faraz" Raahat-E-Jaan Bhi Whi Hai Kya Kije
Wo Jiske Hath Se Seena-Figaar Apna Hai


26


थक गया है मुसलसल सफ़र उदासी का
और अब भी है मेरे शाने पे सर उदासी का


वो कौन कीमिया-गर था के जो बिखेर गया
तेरे गुलाब से चेहरे पे ज़र उदासी का


मेरे वजूद के खि़ल्वते-क़दे में कोई तो था,
जो रख गया है दिया ताख पर उदासी का


मैं तुझसे कैसे कहूँ यार-ए-मेहरबां मेरे,
के तू ही इलाज़ है मेरी हर उदासी का


ये अब जो आग का दरिया मेरे वजूद में है,
यही तो पहले-पहल था शरार उदासी का


ना जाने आज कहाँ खो गया सितार-ए-शाम
वो मेरा दोस्त, मेरा हमसफ़र उदासी का,


‘फ़राज़’ दीदा-ए-पुराब में ना ढूंढ उसे,
के दिल की तह में कहीं है गोहर उदासी का


Thak Gaya Hai Musalsal Safar Udaasi Ka
Aur Ab Bhi Hai Mere Shaane Pe Sar Udaasi Ka


Wo Kaun Kimiya-Gr Tha Ke Jo Bikher Gaya
Tere Gulaab Se Chehre Pe Zar Udaasi Ka


Mere Vajood Ke Khilwate-Kade Me Koi Toh Tha
Jo Rakh Gaya Hai Diya Takh Par Udaasi Ka


Mai Tujhse Kasie Kahu Yaar-E-Meharbaan Mere
Ke Tu Hi Ilaaz Hai Meri Har Udaasi Kaa


Ye Ab Jo Aag Ka Dariya Mere Vajood Me Hai
Yahi Toh Pehle Pahal Tha Sharaar Udaasi Ka


Naa Jaane Aaj Kaha Kho Gaya Sitaar-E-Shaam
Wo Mere Dost Mera Humsafar Udaasi Ka


"Faraaz" Deed-E-Puraab Me Naa Dhoondh Use
Ke Dil Ke Teh Me Kahi Hai Gohar Udaasi Ka


27


दिल को अब यूँ तेरी हर एक अदा लगती है
जिस तरह नशे की हालत में हवा लगती है


रतजगे खवाब परेशाँ से कहीं बेहतर हैं
लरज़ उठता हूँ अगर आँख ज़रा लगती है


ऐ, रगे-जाँ के मकीं तू भी कभी गौर से सुन,
दिल की धडकन तेरे कदमों की सदा लगती है


गो दुखी दिल को हमने बचाया फिर भी
जिस जगह जखम हो वहाँ चोट लगती है


शाखे-उममीद पे खिलते हैं तलब के गुनचे
या किसी शोख के हाथों में हिना लगती है


तेरा कहना कि हमें रौनके महफिल में "फराज़"
गो तसलली है मगर बात खुदा लगती है


28


रोग ऐसे भी ग़म-ए-यार से लग जाते हैं
दर से उठते हैं तो दीवार से लग जाते हैं


इश्क़ आग़ाज़ में हल्की सी ख़लिश रखता है
बाद में सैकड़ों आज़ार से लग जाते हैं


पहले पहले हवस इक-आध दुकाँ खोलती है
फिर तो बाज़ार के बाज़ार से लग जाते हैं


बेबसी भी कभी क़ुर्बत का सबब बनती है
रो न पाएँ तो गले यार से लग जाते हैं


कतरनें ग़म की जो गलियों में उड़ी फिरती हैं
घर में ले आओ तो अम्बार से लग जाते हैं


दाग़ दामन के हों दिल के हों कि चेहरे के 'फ़राज़'
कुछ निशाँ उम्र की रफ़्तार से लग जाते हैं


Rog Aise Bhi Gum-E-Yaar Se Lag Jaate Hai
Dar Se Uthte Hai Toh Deewar Se Lag Jaatein Hai


Ishq Agaaz Me Halki Si Khalish Rakhta Hai
Baad Me Saikdon Azaar Se Lag Jaatein Hai


Pehle-Pehle Hawash Ik-Aadh Dukaan Kholti Hai
Phir Toh Bazaar K Bazaar Se Lag Jaatein Hai


Bebasi Bhi Kabhi Qurbat Ka Sabab Banati Hai
Ro N Paaye To Gale-E-Yaar Se Lag Jaatein Hai


Katarne Gum Ki Jo Galiyon Me Udi Firti Hai
Ghar Me Le Aao Toh Ambaar Se Lag Jaatein Hai


Daagh Daman K Ho Dil K Ho Ki Chehre K "Faraaz"
Kuch Nishaan Umr Ki Raftaar Se Lag Jaate Hai


29


नहीं जो दिल में जगह तो नज़र में रहने दो
मेरी हयात को अपने असर में रहने दो


कोई तो ख़्वाब मेरी रात का मुक़द्दर हो
कोई तो अक्स मेरी चश्म-ए-तर में रहने दो


मैं अपनी सोच को तेरी गली मैं छोड़ आया
तो अपनी याद को मेरे हुनर में रहने दो


ये मंजिलें तो किसी और का मुक़द्दर हैं
मुझे बस अपने जूनून के सफ़र में रहने दो


हकीक़तें तो बहुत तल्ख़ हो गयी हैं "फ़राज़"
मेरे वजूद को ख़्वाबों के घर में रहने दो


Nahi Jo Dil Me Jagah To Nazar Me Rehne Do
Meri Hayaat Ko Apne Asar Me Rehne Do


Koi Toh Khwab Meri Raat Ka Mukaddar Ho
Koi Toh Aks Meri Chashm-E-Tar Me Rehne Do


Mai Apni Soch Ko Teri Gali Me Chhod Aaya
Toh Apni Yaad Ko Mere Hunar Me Rehne Do


Ye Manzile Toh Kisi Aur Ka Muqaddar Hai
Mujhe Bas Apne Junoon Ke Safar Me Rehne Do


Haqiqat Toh Bahut Talkh Ho Gayi Hai "Faraz"
Mere Vajood Ko Khwabo Ke Ghar Me Rehne Do


30


पयाम आये हैं उस यार-ए-बेवफ़ा के मुझे
जिसे क़रार न आया कहीं भुला के मुझे


जुदाइयाँ हों तो ऐसी कि उम्र भर न मिले
फ़रेब तो दो ज़रा सिलसिले बढ़ा के मुझे


नशे से कम तो नहीं याद-ए-यार का आलम
कि ले उड़ा है कोई होश पर हवा के मुझे


मैं ख़ुद को भूल चुका था मगर जहाँ वाले
उदास छोड़ गये आईना दिखा के मुझे


तुम्हारे बाम से अब कम नहीं है रिफाते-दार
जो देखना हो तो देखो नज़र उठा के मुझे


खिँची हुई है मेरे आँसुओं में इक तस्वीर
'फराज़' देख रहा है वो मुस्कुरा के मुझे


Payaam Aaye Hai Us Yaar-E-Bewafa Ke Mujhe
Jise Karaar Na Aaya Kahi Bhula Ke Mujhe


Judaaiyaan Ho Toh Aisi Ki Umr Bhar N Mile
Fareb Toh Do Zara Silsile Badha Ke Mujhe


Nashe Se Kam Toh Nahi Yaad-E-Yaar Ka Alam
Ki Le Uda Hai Koi Hosh Par Hawa Ke Mujhe


Mai Khud Ko Bhool Chuka Tha Magar Jahaan Waale
Udaas Chhod Gaye Aaina Dikha Ke Mujhe


Tumhare Baam Se Ab Kam Nahi Hai Rifaatedaar
Jo Dekhna Ho Toh Dekho Nazar Utha Ke Mujhe


Khinchi Hui Hai Mere Aansuo Me Ik Tasveer
'Faraaz' Dekh Raha Hai Wo Muskura Ke Mujhe




 

Ahmad Faraz Shayari In Hindi | अहमद फ़राज़ की शायरी


 

बदन में आग सी चेहरा गुलाब जैसा है
के ज़हर-ए-ग़म का नशा भी शराब जैसा है


कहाँ वो क़ुर्ब के अब तो ये हाल है जैसे
तेरे फ़िराक़ का आलम भी ख़्वाब जैसा है


मगर कभी कोई देखे कोई पढ़े तो सही
दिल आईना है तो चेहरा किताब जैसा है


वो सामने है मगर तिश्नगी नहीं जाती
ये क्या सितम है के दरिया सराब जैसा है


"फ़राज़" संग-ए-मलामत से ज़ख़्म ज़ख़्म सही
हमें अज़ीज़ है ख़ानाख़राब जैसा है


Badan Me Aag Si Chehra Gulaab Jaisa Hai
Ke Zehar-E-Gum Ka Nasha Bhi Sharaab Jaisa Hai


Kaha Wo Kurbe Ke Ab Toh Ye Haal Hai Jaise
Tere Firaaq Kaa Alam Bhi Khwab Jaisa Hai


Magar Kabhi Koi Dekhe Koi Padhe Toh Sahi
Dil Aaina Hai Toh Chehra Kitaab Jaisa Hai


Wo Samne Hai Magar Tishnagi Nahi Jaati
Ye Kya Sitam Hai K Dariya Ab Saraab Jaisa Hai


"Faraaz" Sang-E-Malamat Se Zakhm-Zakhm Nahi
Hame Azeej Hai Khaana Saraab Jaisa Hai


 

बरसों के बाद देखा


बरसों के बाद देखा इक शख़्स दिलरुबा सा
अब ज़हन में नहीं है पर नाम था भला सा


आबरू खिंचे-खिंचे से आँखें झुकी झुकी सी
बातें रुकी रुकी सी लहजा थका थका सा


अल्फ़ाज़ थे के जुग्नू आवाज़ के सफ़र में
बन जाये जंगलों में जिस तरह रास्ता सा


ख़्वाबों में ख़्वाब उस के यादों में याद उस की
नींदों में घुल गया हो जैसे के रतजगा सा


पहले भी लोग आये कितने ही ज़िन्दगी में
वो हर तरह से लेकिन औरों से था जुदा सा


अगली मुहब्बतों ने वो नामुरादियाँ दीं
ताज़ा रफ़ाक़तों से दिल था डरा डरा सा


कुछ ये के मुद्दतों से हम भी नहीं थे रोये
कुछ ज़हर में बुझा था अहबाब का दिलासा


फिर यूँ हुआ के सावन आँखों में आ बसे थे
फिर यूँ हुआ के जैसे दिल भी था आबला सा


अब सच कहें तो यारो हम को ख़बर नहीं थी
बन जायेगा क़यामत इक वाक़िआ ज़रा सा


तेवर थे बेरुख़ी के अंदाज़ दोस्ती के
वो अजनबी था लेकिन लगता था आश्ना सा


हम दश्त थे के दरिया हम ज़हर थे के अमृत
नाहक़ था ज़ोंउम हम को जब वो नहीं था प्यासा


हम ने भी उस को देखा कल शाम इत्तेफ़ाक़न
अपना भी हाल है अब लोगो "फ़राज़" का सा


 

Barso Ke Baad Dekha


Barso Ke Baad Dekha Ik Shakhs Dilruba Sa
Jab Jehan Me Nahi Hai Par Naam Tha Bhala Sa


Aabru Khinche-Khinche Se Ankhe Jhuki-Jhuki Si
Baatein Ruki-Ruki Si Lehja Thaka-Thaka Sa


Alfaaz The Ke Jugnu Awaaz Ke Safar Me
Ban Jaaye Janglo Me Jis Tarah Raasta Sa


Khwabo Me Khwab Us Ke Yaadon Me Yaad Us Ki
Nindo Me Ghul Gaya Ho Jaise Ke Rat-Jga Sa


Pahle Bhi Log Aaye Kitne Hi Zindgi Me
Wo Har Tarah Se Lekin Auron Se Tha Judaa Sa


Agli Mohabbaton Ne Wo Namuraadiyaa Di
Taaza Rafaqaton Se Dil Tha Dara-Dara Sa


Kuch Ye Ki Mudatton Se Hum Bhi Nahi The Roye
Kuch Zehar Me Bujha Tha Ahbaab Ka Dilasa


Phir Yun Hua Ki Saawan Ankho Me Aa Base The
Phir Yun Hua Ki Jaise Dil Bhi Tha Aabla sa


Ab Sach Kahe Toh Yaaron Humko Khabar Nahi Thi
Ban Jayega Kayamat Ik Wakiya Zara Sa


Tevar The Berukhi Ke Andaaz Dosti Ke
Wo Ajnabi Tha Lekin Lagta Tha Aashna Sa


Hum Dasht The Ke Dariya Hum Zehar The Ki Amrit
Nahak Tha Jounm Hum Ko Jab Wo Nahi Tha Pyasa


Hum Ne Bhi Usko Dekha Kal Shaam Ittefakan
Apna Bhi Ab Haal Hai Ab Logon Kaa "Faraaz" Sa


 

यूँ तुझे ढूँढने निकले


यूँ तुझे ढूँढने निकले की ना आये खुद भी
वो मुसाफ़िर की जो मंजिल थे बजाये खुद भी


कितने ग़म थे की ज़माने से छुपा रक्खे थे
इस तरह से की हमें याद ना आये खुद भी


ऐसा ज़ालिम की अगर ज़िक्र में उसके कोई ज़ुल्म
हमसे रह जाए तो वो याद दिलाये ख़ुद भी


लुत्फ़ तो जब है ताल्लुक में की वो शहर-ए-जमाल
कभी खींचे, कभी खींचता चला आये खुद भी


ऐसा साक़ी हो तो फिर देखिये रंग-ए-महफ़िल
सबको मदहोश करे होश से जाए खुद भी


यार से हमको तग़ाफ़ुल का गिला क्यूँ हो के हम
बारहाँ महफ़िल-ए-जानां से उठ आये खुद भी


Yun Tujhe Dhoondhne Nikle Ki Na Aaye Khud Bhi
Wo Musafir Ke Jo Manzil The Bajaay Khud Bhi


Kitne Gum The Ki Jamane Se Chupa Rakkhe The
Is Tarah Se Ki Hame Yaad Na Aaye Khud Bhi


Aisa Zalim Ki Agar Zikr Me Uske Koi Zulm
Hamse Reh Jaaye Toh Wo Yaad Dilaaye Khud Bhi


Lutf Toh Jab Hai Talluk Me Ki Wo Shehar-E-Jamaal
Kabhi Khinche Kabhi Khinchta Chala Aaye Khud Bhi


Aisa Saaki Ho Toh Phir Dekhiye Rang-E-Mehfil
Sabko Madhosh Kare Hosh Se Jaaye Khud Bhi


Yaar Se Hamko Tagaful Ka Gila Kyu Ho Ke Hum
Baraahan Mehfil-E-Jaana Se Uth Aaye Khud Bhi


34


यूँ ही मर मर के जिएँ वक़्त गुज़ारे जाएँ
ज़िंदगी हम तेरे हाथों से न मारे जाएँ


अब ज़मीं पर कोई गौतम न मोहम्मद न मसीह
आसमानों से नए लोग उतारे जाएँ


वो जो मौजूद नहीं उस की मदद चाहते हैं
वो जो सुनता ही नहीं उस को पुकारे जाएँ


बाप लर्ज़ां है कि पहुँची नहीं बारात अब तक
और हम-जोलियाँ दुल्हन को सँवारे जाएँ


हम कि नादान जुआरी हैं सभी जानते हैं
दिल की बाज़ी हो तो जी जान से हारे जाएँ


तज दिया तुम ने दर-ए-यार भी उकता के 'फ़राज़'
अब कहाँ ढूँढने ग़म-ख़्वार तुम्हारे जाएँ


Yun Hi Mar-Mar K Jiye Wakt Guzaare Jayein
Zindgi Hum Tere Hatho Se N Maare Jayein


Ab Jameen Par Koi Gautam N Mohammad N Maseeh
Aasmaano Se Naye Log Utaare Jayein


Wo Jo Wajood Nahi Uski Madad Chahte Hai
Wo Jo Sunta Hi Nahi Us Ko Pukaare Jayein


Baao Larza Hai Ki Pahunchi Nahi Baraat Ab Tak
Aur Hum-Joliyaa Dulhan Ko Sawaare Jayein


Hum Ki Nadaan Juaari Hai Sabhi Jaante Hai
Dil Ki Baazi Ho Toh Ji Jaan Se Haar Jayein


Tz Diya Tumne Dar-E-Yaar Bhi Ukta K "Faraaz"
Ab Kahan Dhoondhne Gum-Khwaar Tumhare Jayein


35


वफ़ा के ख़्वाब मुहब्बत का आसरा ले जा
अगर चला है तो जो कुछ मुझे दिया ले जा


मक़ाम-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ आ गया है फिर जानाँ
ये ज़ख़्म मेरे सही तीर तो उठा ले जा


यही है क़िस्मत-ए-सहरा यही करम तेरा
कि बूँद-बूँद अता कर घटा-घटा ले जा


ग़ुरूर-ए-दोस्त से इतना भी दिलशिकस्ता न हो
फिर उठ के सामने दामन-ए-इल्तजा ले जा


नदामतें हों तो सर बार-ए-दोश होता है
"फ़राज़" जाँ के एवज़ आबरू बचा ले जा


Wafa Ke Khwab Muhabbat Ka Aasra Le Ja
Agar Chala Hai Toh Jo Kuch Mujhe Diya Le Ja


Makaam-E-Sood-O-ziyaan Aa Gaya Hai Phir Jaana
Ye Zakhm Mere Sahi Teer Toh Utha Le Ja


Yahi Hai Kismat-E-Sehra Yahi Karam Tera
Ki Boond-Boond Ata Kar Ghata-Ghata Le Ja


Guroor-E-Dost Se Itna Bhi Dil Shikasta N Ho
Phir Uth Ke Samne Daman-E-Iltza Le Ja


Nadamatein Ho Toh Sar Baar-E-Dosh Hota Hai
"Faraz" Jaan Ke Evaj Aabru Bacha Le Ja


36


हुई है शाम तो आँखों में बस गया फिर तू
कहाँ गया है मेरे शहर के मुसाफ़िर तू


बहुत उदास है इक शख़्स तेरे जाने से
जो हो सके तो चला आ उसी की ख़ातिर तू


मेरी मिसाल कि इक नख़्ल-ए-ख़ुश्क-ए-सहरा हूँ
तेरा ख़याल कि शाख़-ए-चमन का ताइर तू


मैं जानता हूँ के दुनिया तुझे बदल देगी
मैं मानता हूँ के ऐसा नहीं बज़ाहिर तू


हँसी ख़ुशी से बिछड़ जा अगर बिछड़ना है
ये हर मक़ाम पे क्या सोचता है आख़िर तू


"फ़राज़" तूने उसे मुश्किलों में डाल दिया
ज़माना साहिब-ए-ज़र और सिर्फ़ शायर तू


Hui Hai Shaam Toh Ankho Me Bas Gaya Phir Tu
Kaha Gaya Hai Mere Shehar Ke Musafir Tu


Bahut Udaas Hai Ik Shakhs Tere Jaane Se
Jo Ho Sake To Chala Aa Usi Ki Khaatir Tu


Meri Misaal Ki Nakhl-E-Khush-E-Sehra Hoon
Tera Khayal Ki Shakh-E- Chaman Ko Taair Tu


Mai Jaanta Hu Ki Duniya Tujhe Badal Degi
Mai Manta Hu Ke Aisa Nahi Bajahir Tu


Hasi-Khushi Se Bichad Ja Agar Bichadna Hai
Ye Har Makaam Pe Kya Sochta Hai Aakhir Tu


"Faraz" Tune Use Mushkilo Me Daal Diya
Jamana Sahib-E-Zr Aur Sirf Shayar Tu


37


सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं


सुना है रब्त है उसको ख़राब हालों से
सो अपने आप को बरबाद कर के देखते हैं


सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उसकी
सो हम भी उसकी गली से गुज़र के देखते हैं


सुना है उसको भी है शेर-ओ-शायरी से शगफ़
सो हम भी मोजज़े अपने हुनर के देखते हैं


सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं


सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है
सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं


सुना है हश्र हैं उसकी ग़ज़ाल सी आँखें
सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं


सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं


सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उसकी
सुना है शाम को साये गुज़र के देखते हैं


सुना है उसकी सियाह चश्मगी क़यामत है
सो उसको सुरमाफ़रोश आह भर के देखते हैं


सुना है उसके लबों से गुलाब जलते हैं
सो हम बहार पर इल्ज़ाम धर के देखते हैं


सुना है आईना तमसाल है जबीं उसकी
जो सादा दिल हैं उसे बन सँवर के देखते हैं


सुना है जब से हमाइल हैं उसकी गर्दन में
मिज़ाज और ही लाल-ओ-गौहर के देखते हैं


सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में
पलंग ज़ाविए उसकी कमर के देखते हैं


सुना है उसके बदन के तराश ऐसे हैं
के फूल अपनी क़बायेँ कतर के देखते हैं


वो सर-ओ-कद है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं
के उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं


बस एक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का
सो रहर्वान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं


सुना है उसके शबिस्तान से मुत्तसिल है बहिश्त
मकीन उधर के भी जलवे इधर के देखते हैं


रुके तो गर्दिशें उसका तवाफ़ करती हैं
चले तो उसको ज़माने ठहर के देखते हैं


किसे नसीब के बे-पैरहन उसे देखे
कभी-कभी दर-ओ-दीवार घर के देखते हैं


कहानियाँ हीं सही सब मुबालग़े ही सही
अगर वो ख़्वाब है ताबीर कर के देखते हैं


अब उसके शहर में ठहरें कि कूच कर जायेँ
फ़राज़ आओ सितारे सफ़र के देखते हैं


अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं
फ़राज़ अब ज़रा लहजा बदल के देखते हैं


जुदाइयां तो मुक़द्दर हैं फिर भी जाने सफ़र
कुछ और दूर ज़रा साथ चलके देखते हैं


रह-ए-वफ़ा में हरीफ़-ए-खुराम कोई तो हो
सो अपने आप से आगे निकल के देखते हैं


तू सामने है तो फिर क्यों यकीं नहीं आता
यह बार बार जो आँखों को मल के देखते हैं


ये कौन लोग हैं मौजूद तेरी महफिल में
जो लालचों से तुझे, मुझे जल के देखते हैं


यह कुर्ब क्या है कि यकजाँ हुए न दूर रहे
हज़ार इक ही कालिब में ढल के देखते हैं


न तुझको मात हुई न मुझको मात हुई
सो अबके दोनों ही चालें बदल के देखते हैं


यह कौन है सर-ए-साहिल कि डूबने वाले
समन्दरों की तहों से उछल के देखते हैं


अभी तलक तो न कुंदन हुए न राख हुए
हम अपनी आग में हर रोज़ जल के देखते हैं


बहुत दिनों से नहीं है कुछ उसकी ख़ैर ख़बर
चलो फ़राज़ को ऐ यार चल के देखते हैं


Suna Hai Log Use Ankh Bhar Ke Dekhate Hai
So Uske Shehar Me Kuch Din Thehar Ke dekhte Hai


Suna Hai Rabt Hai Use Kharaab Haalo Se
So Apne Aao Ko Barbaad Kar Ke Dekhte Hai


Suna Hai Dard Ki Gaahak Hai Chashm-E-Naaz Uski
So Hum Bhi Uski Gali Se Guzar Ke Dekhte Hai


Suna Hai Usko Bhi Hai Sher-O-Shayari Se Sagaf
So Him Bhi Mojaje Apne Hunar Ke Dekhte Hai


Suna Hai Bole To Baaton Se Phool Jhadte Hai
Ye Baat Hai Toh Chalo Baat Kar Ke Dekhte Hai


Suna Hai Raat Use Chand Takta Rehta Hai
Sitaar Baam-E-Falak Se Utar Ke Dekhte Hai


Suna Hai Hashr Hai Uski Gazaal Si Ankhe
Suna Hai Hiran Use Dasht Bhar Ke Dekhte Hai


Suna Hai Din Ki Use Titaliyan Satati Hai
Suna Hai Raat Ko Jugnu Thehar Ke Dekhte Hai


Suna Hai Raat Se Badhkar Hai Kaakule Uski
Suna Hai Shaan Ko Saaye Guzar Ke Dekhte Hai


Suna Hai Uski Siyaah-Chashmgi Kayamat Hai
So Usko Surmaafrosh Aah Bhar Ke Dekhte Hai


Suna Hai Uske Labon Se Gulaab Jalte Hai
So Hum Bahaar Par Ilzaam Dhar Ke Dekhte Hai


Suna Hai Aaina Tamsaal Hai Jabeen Uski
So Saada Dil Hai Use Ban Sawar Ke Dekhte Hai


Suna Hai Jab Se Hamaiil Hai Uski Gardan Me
Mizaaz Aur Hi Laal-O-Gauhar Ke Dekhte Hai


Suna Hai Chashm-E-Tasavvur Dast-E-Imkaan Me
Palang Javiye Uski Kamar Ke Dekhte Hai


Suna Hai Uske Badan Ke Tarashe Aise Hai
Ki Phool Apni Kabayein Katar Ke Dekhte Hai


Wo Sar-o-Kad Hai Magar Begul-E-Muraad Nahi
Ki Us Sazar Pe Shagufe Samar Ke Dekhte Hai


Bas Ek Nigaah Se Lutata Hai Kaafila Dil Ka
So Rahrwwan-E-Tamanna Bhi Dar Ke Dekhte Hai


Suna Hai Uske Shabistaan Se Muttsil Hai Bahisht
Makin Udhar Ke Bhi Jalwe Ke Dekhte Hai


Ruke To Gardish Uska Tawaaf Karti Hai
Chale To Usko Jamane Thehar Ke Dekhte Hai


Kise Naseeb Ke Be-Pairhan Use Dekhe
Kabhi-Kabhi Dar-O-Deewar Ghar Ke Dekhte Hai


Kahaniyaan Hi Sahi Sab Mugalabe Hi Sahi
Agar Wo Khwab Hai Taabir kar Ke Dekhte Hai


Ab Uske Shehar Me Thehre Ki Kooch Kar Jaayein
"Faraz" Aao Sitaare Safar Ke Dekhte Hai


Abhi Kuch Aur Karishme Ghazal Ke Dekhte Hai
Kuch Aur Door Zara Sath Chal Ke Dekhte Hai


N Tujhko Maat Hui N Mujhko Naat Hui
So Abke Dono Hi Chalein Badal Kar Dekhte Hai


Yeh Kaun Hai Sar-E-Saahil Ki Doobne Waale
Samndaro Ki Tahon Se Uchal Ke Dekhte Hai


Abhi Talak Toh Na Kundan Hue N Rakh Hue
Hum Apni Aag Me Har Roz Jal Ke Dekhte Hai


Bahut Dino Se Nahi Hai Kuch Uski Khai Khabar
Chalo Faraz Ko A Yaar Chal Ke Dekhte Hai


38


साथ रोती थी मेरे साथ हंसा करती थी
वो लड़की जो मेरे दिल में बसा करती थी


मेरी चाहत की तलबगार थी इस दर्जे की
वो मुसल्ले पे नमाज़ों में दुआ करती थी


एक लम्हे का बिछड़ना भी गिरां था उसको
रोते हुए मुझको ख़ुद से जुदा करती थी


मेरे दिल में रहा करती थी धड़कन बनकर
और साये की तरह साथ रहा करती थी


रोग दिल को लगा बैठी अंजाने में
मेरी आगोश में मरने की दुआ करती थी


बात क़िस्मत की है ‘फ़राज़’ जुदा हो गए हम
वरना वो तो मुझे तक़दीर कहा करती थी


Sath Roti Thi Mere Sath Hansa Karti Thi
Wo Ladki Jo Mere Dil Me Basa Karti Thi


Meri Chahat Ki Talabgaar Thi Is Darje Ki
Wo Musalle Pe Namaazo Me Dua Karti Thi


Ek Lamhe Ka Bichadna Bhi Giraan Tha Usko
Rote Hue Mujhko Khud Se Judaa Karti Thi


Mere Dil Me Raha Karti Thi Dhadkan Bankar
Aur Saaye Ki Tarah Sath Raha Karti Thi


Rog Dil Ka Laga Baithi Anjaane Me
Mere Aagosh Me Marne Ki Dua Karti Thi


Baat Kismat Ki Hai "Faraaz" Judaa Ho Gaye Hum
Warna Wo Toh Mujhe Takdeer Kaha Karti Thi


39


साक़िया एक नज़र जाम से पहले-पहले
हम को जाना है कहीं शाम से पहले-पहले


ख़ुश हो ऐ दिल! के मुहब्बत तो निभा दी तूने
लोग उजड़ जाते हैं अंजाम से पहले-पहले


अब तेरे ज़िक्र पे हम बात बदल देते हैं
कितनी रग़बत थी तेरे नाम से पहले-पहले


सामने उम्र पड़ी है शब-ए-तन्हाई की
वो मुझे छोड़ गया शाम से पहले-पहले


कितना अच्छा था कि हम भी जिया करते थे 'फ़राज़'
ग़ैर-मारूफ़-से गुमनाम-से पहले-पहले


Saakiya Ek Nazar Jaam Se Pehle-Pehle
Humko Jaana Hai Kahi Shaam Se Pehle-Pehle


Khush Ho Ae Dil Ke Mohabbat To Nibha Di Tune
Log Ujad Jaate Hai Anjaam Se Pehle-Pehle


Ab Tere Zikr Pe Hum Baat Badal Dete Hai
Kitni Ragbat Thi Tere Naam Se Pehle-Pehle


Saamane Umr Padi Hai Shab-E-Tanhaai Ki
Wo Mujhe Chhod Gaya Shaam Se Pehle-Pehle


Kitna Achcha Tha Ki Hum Bhi Jiya Karte The "Faraz"
Gair Maruf Se Gumnaam Se Pehle-Pehle


40


वो जो आ जाते थे आँखों में सितारे लेकर
जाने किस देश गए ख़्वाब हमारे लेकर


छाओं में बैठने वाले ही तो सबसे पहले
पेड़ गिरता है तो आ जाते हैं आरे लेकर


वो जो आसूदा-ए-साहिल हैं इन्हें क्या मालूम
अब के मौज आई तो पलटेगी किनारे लेकर


ऐसा लगता है के हर मौसम-ए-हिज्राँ में बहार
होंठ रख देती है शाख़ों पे तुम्हारे लेकर


शहर वालों को कहाँ याद है वो ख़्वाब फ़रोश
फिरता रहता था जो गलियों में गुब्बारे लेकर


नक़्द-ए-जान सर्फ़ हुआ क़ुल्फ़त-ए-हस्ती में 'फ़राज़'
अब जो ज़िन्दा हैं तो कुछ सांस उधारे लेकर


Wo Jo Aa Jaate The Ankho Me Sitaare Lekar
Jaane Kis Desh Gaye Khwab Hamare Lekar


Chhaon Me Baithne Waale Hi Toh Sabse Pehle
Ped Girta Hai Toh Aa Jaate Hai Aare Lekar


Wo Jo Asuda-E- Saahil Hai Inhe Kya Maloom
Ab Ke Mauj Aai Toh Paltegi Kinaare Lekar


Aisa Lagta Hai Ki Har Mausam-E-Hijraa Me Bahaar
Hoth Rakh Deti Hai Shakho Pe Tumhare Lekar


Shehar Waalo Ko Kaha Yaad Hai Wo Khwab Farosh
Firta Rehta Tha Jo Galiyon Me Gubbare Lekar


Nakd-E-Jaan Sarf Hua Kulfat-E-Hasti Me "Faraz"
Ab Jo Zinda Hai Toh Kuch Sans Udhare Lekar


 

रातें हैं उदास


 

रातें हैं उदास दिन कड़े हैं
ऐ दिल तेरे हौसले बड़े हैं

 

ऐ यादे-हबीब साथ देना
कुछ मरहले सख़्त आ पड़े हैं

 

रूकना हो अगर तो सौ बहाने
जाना हो तो रास्ते बड़े हैं

 

अब किसे बतायें वजहे-गिरीया
जब आप भी साथ रो पड़े हैं

 

अब जाने कहाँ नसीब ले जायें
घर से तो ‘फ़राज़’ चल पड़े हैं

 

Raatein Udaas Hai

 

Raatein Udaas Hai Dun Kade Hai
Ae Dil Tere Hausle Bade Hai

 

Ae Yaade-Habib Sath Dena
Kuch Marhale Sakht Aa Pade Hai

 

Rukna Ho Agar Toh Sau Bahane
Jaana Ho To Raaste Bade Hai


Ab Kise Bataye Wajhe-Giriya
Jab Aap Bhi Sath Ro Pade Hai

 

Ab Jaane Kahan Naseeb Le Jaaein
Ghar Se To "Faraaz" Chal Pade Hai

 

अब के हम बिछड़े


अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें

 

ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती
ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें

 

ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो
नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें

 

तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा
दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें

 

आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर
क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें

 

अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़'
जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

 

Ab Ke Bichde Toh Shayad

 

Ab Ke Bichde Toh Shayad Kabhi Khwabo Me Mile
Jis Tarah Sukhe Hue Phool Kitaabon Me Mile

 

Dhoondh Ujade Hue Logon Me Wafa Ke Moti
Ye Khazane Tujhe Mumkin Hai Kharaabon Me Mile

 

Gum-E-Duniya Bhi Gum-E-Yaar Me Shamil Kar Lo
Nasha Badhta Hai Sharabe Jo Sharaabo Me Mile

 

Tu Khuda Hai Na Mera Ishq Farishto Jaisa
Dono Insaan Hai Toh Kyo Itne Hizaabo Me Mile

 

Aaj Hum Daar Pe Khinche Gaye Jin Baaton Par
Kya Ajab Kal Wo Jamane Ko Nishabo Me Mile

 

Ab N Wo Mai N Wo Tu Hai N Wo Maazi Hai "Faraaz"
Jaise Do Shaksh Tamanna Ke Do Saraabo Me Mile

 

रंजिश ही सही

 

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

 

कुछ तो मेंरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ

 

पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया ही निभाने के लिए आ

 

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ

 

इक उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिर्या से भी महरूम
ऐ राहत-ए-जाँ मुझ को रुलाने के लिए आ

 

अब तक दिल-ए-ख़ुश-फ़हम को तुझ से हैं उम्मीदें
ये आख़िरी शम्माएँ भी बुझाने के लिए आ

 

Ranjish Hi Sahi

 

Ranjish Hi Sahi Dil Hi Dukhane Ke Liye Aa
Aa Phir Se Mujhe Chor Jaane Ke Liye Aa

 

Kuch To Mere Pindaar-E-Mohabbat Ka Bharam Rakh
Tu Bhi Toh Kabhi Mujhko Manane Ke Liye Aa

 

Pehle Se Marasim Na Sahi Phir Bhi Kabhi Toh
Rasm-O-Raah-E-Duniya Hi Nibhane Aa

 

Kis Kis Ko Batayenge Judaai Kaa Sabab Hum
Tu Mujhse Khafa Hai Toh Jamane Ke Liye Aa

 

Ik Umr Se Hoon Lazzat-E-Girya Se Bhi Mehroom
Ae Rahat-E-Jaan Mujhko Rulane Ke Liye Aa

 

Ab Tak Dil-E-Khush- Faham Ko Tujhse Hai Umeede
Ye Akhir Shammaye Bhi Bujhane Ke Liye Aa

 

आशिक़ी में 'मीर' जैसे

 

आशिक़ी में 'मीर' जैसे ख़्वाब मत देखा करो
बावले हो जाओगे महताब मत देखा करो

 

जस्ता जस्ता पढ़ लिया करना मज़ामीन-ए-वफ़ा
पर किताब-ए-इश्क़ का हर बाब मत देखा करो

 

इस तमाशे में उलट जाती हैं अक्सर कश्तियाँ
डूबने वालों को ज़ेर-ए-आब मत देखा करो

 

मय-कदे में क्या तकल्लुफ़ मय-कशी में क्या हिजाब
बज़्म-ए-साक़ी में अदब आदाब मत देखा करो

 

हम से दरवेशों के घर आओ तो यारों की तरह
हर जगह ख़स-ख़ाना ओ बर्फ़ाब मत देखा करो

 

माँगे-ताँगे की क़बाएँ देर तक रहती नहीं
यार लोगों के लक़ब-अलक़ाब मत देखा करो

 

तिश्नगी में लब भिगो लेना भी काफ़ी है 'फ़राज़'
जाम में सहबा है या ज़हराब मत देखा करो

 

Aashiuqi Me "Meer" Jaise


Aashiuqi Me "Meer" Jaise Khwab Mat Dekha Karo
Baawle Ho Jaaigo Mehtaab Mt Dekha Karo

 

Zasta-Zasta Padh Liya Karna Mazameen-E-Wafa
Par Kitaab-E-Ishq Ka Har Baab Mat Dekha Karo

 

Is Tamashe Me Ulat Jaati Hai Aksar kashtiyan
Doobne Waalon Ko Zer-E-Aaab Mat Dekha Karo

 

Maykade Me Kya Takalluf Maykshi Me Kya Hizaab
Bazm-E-Saaki Me Adab Adaab Mat Dekha Karo

 

Hum Se Darwesho Ke Ghar Aao Toh Yaaro Ki Tarah
Har Jagah Bas Khaana-O-Barfaab Mat Dekha Karo

 

Tange-Tange Ki Kabayein Der Tak Rehti Nahi
Yaar Logon K Laqab- Alqaab Mat Dekha Karo

 

Tishnagi Me Lab Bhigo Lena Bhi Kaafi Hai "Faraaz"
Zaam Me Sehba Hai Yaa Zehraab Mat Dekha Karo

 

अब और क्या किसी से

 

अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम
ये भी बहुत है तुझ को अगर भूल जाएँ हम

 

सहरा-ए-ज़िंदगी में कोई दूसरा न था
सुनते रहे हैं आप ही अपनी सदाएँ हम

 

इस ज़िंदगी में इतनी फ़राग़त किसे नसीब
इतना न याद आ कि तुझे भूल जाएँ हम

 

तू इतनी दिल-ज़दा तो न थी ऐ शब-ए-फ़िराक़
आ तेरे रास्ते में सितारे लुटाएँ हम

 

वो लोग अब कहाँ हैं जो कहते थे कल 'फ़राज़'
है ख़ुदा-न-कर्दा तुझे भी रुलाएँ हम

 

Ab Aur Kya Marasim


Ab Aur Kya Marasim Badhaye Hum
Ye Bhi Bahut Hai Tujhko Agar Bhool Jaayein Hum

 

Sehra-E-Zindgi Me Koi Dusra N Tha
Sunte Rahe Hai Aap Hi Apni Sadaye Hum

 

Is Zindgi Me Itni Fatafat Kise Naseeb
Itna N Yaad Aa Ki Tujhe Bhool Jaaye Hum

 

Tu Itni Dil-Zda Toh N Thi Ae Shab-E-Firaak
Aa Tere Raaste Me Sitaare Lootaye Hum

 

Wo Log Ab Kahan Hai Jo Kehte The Kl "Faraaz"
Hai Khuda N Karda Tujhe Bhi Rulaye Hum

 

दोस्त बन कर भी नहीं

 

दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला
वही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला

 

अब उसे लोग समझते हैं गिरफ़्तार मिरा
सख़्त नादिम है मुझे दाम में लाने वाला

 

सुब्ह-दम छोड़ गया निकहत-ए-गुल की सूरत
रात को ग़ुंचा-ए-दिल में सिमट आने वाला

 

क्या कहें कितने मरासिम थे हमारे उस से
वो जो इक शख़्स है मुँह फेर के जाने वाला

 

तेरे होते हुए आ जाती थी सारी दुनिया
आज तन्हा हूँ तो कोई नहीं आने वाला

 

मुंतज़िर किस का हूँ टूटी हुई दहलीज़ पे मैं
कौन आएगा यहाँ कौन है आने वाला

 

क्या ख़बर थी जो मेरी जाँ में घुला है इतना
है वही मुझ को सर-ए-दार भी लाने वाला

 

मैं ने देखा है बहारों में चमन को जलते
है कोई ख़्वाब की ताबीर बताने वाला

 

तुम तकल्लुफ़ को भी इख़्लास समझते हो 'फ़राज़'
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला

 

Dost Ban Kar Bhi Nahi

 

Dost Ban Kar Bhi Nahi Sath Nibhaane Waala
Wahi Andaaz Hai Zaalim Ka Jamane Waala

 

Ab Use Log Samjhte Hai Giraftaar Mera
Sakhta Naadim Hai Mujhe Daam Me Laane Wala

 

Subh-Dm Chod Gaya Niqhat-E-Gul Ki Surat
Raat Ko Guncha-E-Dil Me Simat Aane Waala

 

Kya Kahe Kitne Marasim The Hamare Us Se
Wo Jo Ik Shakhsh Hai Muh Fer K Jaane Walaa

 

Tere Hote Hue Aa Jaati Thi Saari Duniya
Aaj Tanha Hoon Toh Koi Nahi Aane Walaa

 

Muntzir Kis Ka Hoon Tooti Hui Dehliz Pe Mai
Kaun Ayega Yaha Kaun Hai Aane Waala

 

Kya Khabar Thi Jo Meri Jaan Me Ghula Hai Itna
Hai Wahi Mujhko Sar-E-Daar Bhi Laane Waala

 

Maine Dekha Hai Baharon Me Chaman Ko Jalte
Hai Koi Khwab Ki Taabeer Batane Waala

 

Tum Takalluf Ko Bhi Ikhlaas Samjhte Ho "Faraaz"
Dost Hota Nahi Har Hath Milaane Waala




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Ahmad Faraz Shayari In Hindi | अहमद फ़राज़ की शायरी Ahmad Faraz Shayari In Hindi | अहमद फ़राज़ की शायरी Reviewed by Feel neel on February 26, 2020 Rating: 5

5 comments:

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